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अंतरिक्ष का कूड़ा

हमारी मुश्किलें न बढ़ा दे कहीं अंतरिक्ष का मलबा

(जसप्रीत बिंद्रा, तकनीक विशेषज्ञ)

(साभार हिंदुस्तान )


गोसिनी और उडरजो द्वारा लिखित कालजयी एस्ट्रिक्स कॉमिक्स शृंखला में गॉलवासियों की एकमात्र चिंता यही थी कि कहीं आसमान उनके सिर पर न गिर जाए। कोविड से लड़ती दुनिया में यह डर फिर से लौट आया, जब खबर आई कि चीन के लॉन्ग मार्च सैटेलाइट का 23 टन वजन वाला बूस्टर पृथ्वी पर गिर सकता है। बेशक हिंद महासागर में इसके गिरने से जान-माल का नुकसान नहीं हुआ, लेकिन यह खौफ खत्म नहीं हुआ है कि भविष्य में इस तरह की घटना नहीं होगी। वास्तव में, अंतरिक्ष के मलबे का यूं बेलगाम होकर घरती पर गिरने का यह चौथा मामला था। साल 1979 की घटना तो सबसे बड़ी है, जब स्काइलैब अंतरिक्ष स्टेशन अनियंत्रित होकर जमीन पर आ गिरा था।

अभी 12.8 करोड़ मानव-निर्मित वस्तुएं पृथ्वी के चक्कर लगा रही हैं। इनमें से 34 हजार का आकार 10 सेंटीमीटर से अधिक है, जबकि 3,000 ऐसे उपग्रह हैं, जिनकी सेवाएं ली जा रही हैं। 50 बेकाम हो चुके लॉन्ग मार्च के आकार वाले बूस्टर भी धरती के चारों ओर घूम रहे हैं, और वे तब तक परिक्रमा करते रहेंगे, जब तक कि उनको गिराने का फैसला नहीं लिया जाएगा। ऐसे में, कोई मलबा यदि अनियंत्रित होकर पृथ्वी से टकराएगा, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है, फिर चाहे लाखों में ऐसी कोई एक घटना होने की आशंका ही क्यों न हो। वैसे, आने वाले दिन और दिलचस्प होने वाले हैं, क्योंकि दुनिया की दो सबसे अमीर हस्तियों ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में कदम रखा है। शुरुआत एलन मस्क ने स्टारलिंक सैटेलाइट नेटवर्क के साथ की, जिसको उनकी रॉकेट कंपनी स्पेसएक्स ने बनाया है। वह पहले ही करीब 1,500 ऐसे उपग्रह अंतरिक्ष में भेज चुके हैं, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में रहेंगे। मस्क की योजना इन उपग्रहों की संख्या 12 हजार तक करने की है।

दूसरा नाम अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस का है, जो कुइपर प्रोजेक्ट पर हर साल एक अरब डॉलर की रकम खर्च कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत उनकी कंपनी ब्लू ऑरिजिन 3,000 से अधिक उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजेगी। अन्य अरबपतियों में, भारती कंपनी के सुनील मित्तल ने ब्रिटिश सरकार, सॉफ्टबैंक और ह्यूजेस नेटवर्क सिस्टम के साथ हाथ मिलाया है और वह वनवेब कंपनी के माध्यम से 650 उपग्रह भेज रहे हैं। चीन तो 13 हजार उपग्रहों का मजबूत होंगयान सिस्टम बना रहा है। अरबपति रिचर्ड ब्रानसन तो 35 हजार फुट की ऊंचाई पर उड़ रहे बोइंग 747 के पंख से रॉकेट लगे उपग्रहों को छोड़ने की योजना बना रहे हैं। आखिर इतनी आपाधापी क्यों? इसमें दो राय नहीं कि इसकी असल वजह कारोबारी अनिवार्यता है। सभी का सपना दुनिया को 5जी इंटरनेट नेटवर्क से जोड़ना है। आज भी तीन अरब लोग इंटरनेट से दूर हैं, जबकि कई कम मानक का नेटवर्क इस्तेमाल कर रहे हैं। महामारी के बाद की दुनिया में इंटरनेट से दूरी कई लोगों को रोजगार से, बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से और दूरदराज के लोगों को चिकित्सा-सुविधाओं से दूर कर देगी। अब तक दुनिया की करीब आधी आबादी को जोड़ना बेहद लाभदायक उद्यम रहा है, इसलिए बाकी बचे लोगों को भी जोड़ लेना स्वाभाविक ही कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। सैटेलाइट इंटरनेट के कई फायदे हैं। इसमें जमीन पर तार का जाल बिछाने के लिए किसी तरह की अनुमति नहीं लेनी पड़ती, जिस कारण लागत कम हो जाती है। खुदाई-कार्य न होने से पर्यावरण को कम नुकसान होता है। और, केबल की तुलना में 40 फीसदी अधिक गति से इंटरनेट सेवा मिल सकती है। हालांकि, कुछ दिक्कतें भी हैं। जैसे, इसमें लॉन्च की प्रक्रिया महंगी है, इसमें जटिल तकनीक की जरूरत होती है, और फिर आम लोगों के लिए इंटरनेट सेवा महंगी हो सकती है। एक बड़ा मसला मलबा भी है। हमारे ग्रह के चारों ओर चक्कर लगा रहे 3,000 से अधिक उपग्रह आपस में टकराकर 30 हजार टुकड़ों में बंट सकते हैं। हर एक टक्कर भविष्य की अन्य भिड़ंत का कारण भी बन सकती है, जो न सिर्फ अंतरिक्ष के अन्वेषण को मुश्किल बना सकता है, बल्कि धरती पर मलबों की बरसात भी करा सकता है। एस्ट्रिक्स कॉमिक्स शृंखला में तो कुछ जादुई लेप से इस मसले का हल हुआ है, लेकिन हम इंसानों के पास क्या बचाव का कोई नुस्खा है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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