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आपदा और प्रशासन

प्रशासन को आपदा से लड़ने योग्य बनाने की जरूरत

(नितिन पाई, निदेशक, तक्षशिला संस्थान)

(साभार हिंदुस्तान )


ब्रिटिश मीडिया में आए अदार पूनावाला के बयानों के बाद, 3 मई को भारत सरकार ने एक विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि उसने कोविशिल्ड की 11 करोड़ खुराक के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को और कोवाक्सिन की पांच करोड़ खुराक के लिए भारत बायोटेक को आदेश दिए थे। यह आपूर्ति तीन महीनों में करनी थी और इसके लिए भुगतान भी अप्रैल के अंतिम सप्ताह में कर दिया गया था। अपनी विज्ञप्ति में सरकार ने संबंधित टीकों की 10 करोड़ और दो करोड़ खुराक के पिछले आदेश का भी जिक्र किया था, जिनमें से क्रमश: 87 प्रतिशत और 44 प्रतिशत की आपूर्ति हो चुकी थी। टीकों को मंजूरी मिलने के बाद और उस महीने के मध्य में भारत में टीकाकरण कार्यक्रम शुरू होने से पहले, संभवत: सबसे पहला ऑर्डर या आदेश जनवरी में दिया गया था। इसके विपरीत, ब्रिटिश सरकार ने मई 2020 की शुरुआत में ही एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की नौ करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया था, इतनी खुराक ब्रिटेन की 67 प्रतिशत आबादी को टीका देने के लिए पर्याप्त है। उसी महीने, अमेरिकी सरकार ने 30 करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया था, जो उसकी 46 प्रतिशत आबादी के लिए पर्याप्त था। सितंबर 2020 तक, जापान, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी और ब्राजील सभी ने टीकों के लिए ऑर्डर दे दिए। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी देशों ने टीकों के लिए ऑर्डर तब दिए, जब टीके मौजूद नहीं थे। यह एक दांव था। लेकिन ऐसे बडे़ दांव लगाकर ही विकसित देशों ने अपने जोखिम को कम किया। यह बात भी गौरतलब है कि जब ऑर्डर ज्यादा हो, तब धन भी ज्यादा होता है और इससे सफल टीका निर्माण की संभावना भी बढ़ जाती है।

क्या भारत सरकार उन चीजों को खरीद सकती है, जो अभी मौजूद नहीं हैं? इस सवाल का जवाब बेशक ‘हां’ है, मगर यह भारत के हिसाब से बहुत बड़ा फैसला है। इसके लिए मौजूदा नियमों को बदलना पड़ सकता है। व्यावहारिक प्रश्न यह है : कौन सा सरकारी अधिकारी, मंत्री या जनसेवक ऐसी खरीद पर हस्ताक्षर करना चाहेगा? यदि खरीदी गई गैर-मौजूद वैक्सीन नाकाम हो जाती है, तो फैसला लेने वालों का न सिर्फ करियर समाप्त हो जाएगा, जेल भी जाना पड़ सकता है। इसलिए हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि टीकों के अस्तित्व में आने के बाद ही भारत ने जनवरी में इसका ऑर्डर दिया। कोई अचरज नहीं कि ऑर्डर की मात्रा छोटी थी। आज अगर हमें बेहतर प्रशासनिक परिणाम सुनिश्चित करना है, तो हमें अपनी प्रशासनिक संरचना व निर्णय लेने की संस्कृति की सीमाओं को समझना चाहिए। एक कानून बनाने, सुप्रीम कोर्ट से फैसला हासिल करने या भिन्न नेताओं को चुनने से नतीजे नहीं बदल जाएंगे। जब तक हम सरकार की संरचना, प्रक्रिया और संस्कृति में सुधार नहीं करते, तब तक इस व्यवस्था से निराश होते रहेंगे। अभी हम दवाओं के नि:शुल्क वितरण, टैक्स में रियायत की राह भी आसान नहीं कर पा रहे हैं।

यदि कोई व्यवस्था काम करती है, तो इसलिए कि उसके अच्छे लोगों के कार्यों के परिणाम बुरे लोगों के कार्यों के दुष्परिणामों से आगे निकल जाते हैं। यदि उन अच्छे लोगों के पास कार्य करने की शक्ति, अधिकार और प्रोत्साहन नहीं है, तो व्यवस्था फलदायी नहीं होती है। हम केवल असाधारण, साहसी, वीर और करियर के प्रति आत्मघाती अधिकारियों पर ही निर्भर नहीं कर सकते, सभी अधिकारियों को अपने कर्तव्य के दायरे में निर्णय लेने और सार्वजनिक हित में कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। महामारी हमारे प्रशासनिक लक्ष्यों, संरचनाओं व प्रक्रियाओं के संदर्भ में मूलभूत पुनर्विचार की जरूरत पर प्रकाश डाल रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य तक, हमारी सरकार की अक्षमता ने भारत को जल्दी कार्य करने, जरूरी जोखिम उठाने और जो अनिवार्य है, उसे भी जल्दी खरीदने से रोक दिया है। राजनीतिक जिम्मेदारी की पहचान आसान है, और चुनाव के जरिए जवाबदेही तय करने की व्यवस्था हमारे हाथों में है। नागरिक क्या चुनते हैं, कैसे चुनते हैं, यह अलग मामला है। पर आज सरकार में ऐसे बदलाव या ‘री-इंजीनियरिंग’ की जरूरत है, जो दो दशक या अधिक समय से लंबित हैं। यह शर्मनाक होगा, यदि हम भारी पीड़ा से गुजरने के बावजूद इस ओर ध्यान देने को प्रेरित न हों।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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