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एक लेख,हिंदुस्तान से साभार

महामारी की चुनौतियों के बीच धन बरसाते प्रवासी

(जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री)

(साभार हिंदुस्तान )


पिछले साल से ही देश कोरोना संक्रमण से हलकान है; पूर्ण व आंशिक लॉकडाउन से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवांडोल है। ऐसे में, प्रवासी भारतीय अपनी माटी के खूब काम आए, आ रहे हैं। विश्व बैंक द्वारा हाल ही मेें जारी ‘माइग्रेशन ऐंड डेवलमपेंट ब्रीफ’ रिपोर्ट 2020 के मुताबिक, विदेश में कमाकर अपने देश में धन (रेमिटेन्स) भेजने के मामले में भारतीय प्रवासी दुनिया में सबसे आगे रहे हैं। पिछले वर्ष प्रवासी भारतीयों ने 83 अरब डॉलर से अधिक की धनराशि स्वदेश भेजी। पिछले वर्ष कोरोना के कारण उपजी अनिश्चितता और आशंकाओं ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की रफ्तार थाम दी थी। इस आर्थिक सुस्ती के चलते भारतीय प्रवासियों की आमदनी में भी कमी आई। इसीलिए वर्ष 2019 में भेजी गई 83.3 अरब डॉलर की तुलना में साल 2020 में उनका योगदान 0.2 फीसदी कम रहा। फिर प्रवासियों से सर्वाधिक धन प्राप्त करने वाले देशों की सूची में भारत साल 2008 से अब तक पहले क्रम पर बना हुआ है। इसके बाद चीन, मैक्सिको, फिलीपींस और मिस्र इत्यादि देश हैं। वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के प्रवासियों ने अपने-अपने देश को पिछले साल कुल 540 अरब की राशि भेजी थी, जबकि 2019 में यह आंकड़ा 548 अरब डॉलर था। यानी वैश्विक स्तर पर 2019 की तुलना में 1.9 फीसदी की कमी आई। यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले साल जब ऋणात्मक विकास दर की स्थिति में पहुंच गई थी और देश के उद्योग-कारोबार धराशाई हो गए थे, तब प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई 83 अरब डॉलर की बड़ी धनराशि से अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला, और कोरोना-काल में भी भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बढ़ता हुआ दिखाई दिया। 7 मई, 2021 की स्थिति के मुताबिक, देश का विदेशी मुद्रा कोष लगातार बढ़ते हुए 589 अरब डॉलर से अधिक की ऊंचाई पर पहुंच गया है।

दुनिया के करीब 210 देशों में रह रहे प्रवासी भारतीय देश की महान पूंजी हैं। प्रवासी भारतीयों के साथ भारत के संबंध वैसे तो हमेशा से गहरे रहे हैं, लेकिन इसे ऊर्जावान बनाने में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक अहम पहल की थी। उन्हीं के प्रयासों से साल 2003 से प्रवासी भारतीय दिवस समारोह शुरू हुआ। निस्संदेह, दुनिया के कोने-कोने में बसे प्रवासी भारतीयों का देश के प्रति स्नेह भाव और आकर्षण बढ़ता गया। वे न केवल अपनी कमाई का एक भाग भारत भेज रहे हैं, बल्कि भारत के दुख-दर्द में भी पूरी आत्मीयता के साथ खडे़ होते रहे हैं। पिछले वर्ष महामारी के शुरुआती विस्फोट के समय विदेश में जो जहां था, उसे वहीं लॉक कर दिया गया था, अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रुक गई थीं। ऐसे में, विदेशी धरती पर लाखों भारतीय उद्यमी, कारोबारी तथा पर्यटक फंस गए थे। चिंता और अनिश्चितता के उस दौर में फंसे भारतीयों को प्रवासी हमवतनों का हर तरह से साथ मिला। प्रवासियों ने स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए पीएम केयर्स में भरपूर योगदान भी दिया था। यदि हम चाहते हैं कि प्रवासी भारतीय भारत को मजबूत बनाने में अपनी सहभागिता बढ़ाएं, तो हमें भी उनके प्रति सांस्कृतिक सहयोग और स्नेह बढ़ाना होगा। जिस तरह, पिछले वर्ष परेशान प्रवासियों की घर वापसी के लिए सरकार ने वंदे भारत मिशन चलाया और लगभग 45 लाख प्रवासी भारतीयों को भारत वापस लाया गया, उससे प्रवासी भारतीयों के मन में अपने मूल देश के लिए आत्मीयता और बढ़ी है। लेकिन अभी भी हमें उनसे जुड़ी विभिन्न समस्याओं के निराकरण के लिए काम करने की जरूरत है। वस्तुत: दुनिया के सारे प्रवासी भारतीय बहुत धनी नहीं हैं। ‘कॉमन वेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ की एक रिपोर्ट में खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीय कामगारों की मुश्किलों और विपरीत परिस्थितियों में काम करने संबंधी चिंताएं प्रस्तुत की गई हैं। जहां भारत को विभिन्न विकसित और विकासशील देशों में प्रवासियों की वीजा संबंधी मुश्किलों को कम करना चाहिए, वहीं विदेश में रोजगार-प्रक्रिया को सरल व पारदर्शी बनाने पर जोर देना होगा, ताकि हमारे कामगारों को बेईमान बिचौलियों व शोषक नियोक्ताओं से बचाया जा सके। विदेश में बसे भारतीयों के स्वदेश आगमन पर आत्मीय स्वागत के साथ-साथ उनके लिए आव्रजन व सीमा शुल्क संबंधी प्रक्रिया को भी आसान बनाना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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