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कंपनी समाचार,साभार बिज़नेस स्टैण्डर्ड

परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों के पुनर्गठन की जरूरत

(तमाल बंद्योपाध्याय)

(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड )

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की एक समिति परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) की कार्य पद्धति की 'व्यापक समीक्षा' कर रही है। समिति ने निवेशकों सहित संबंधित पक्षों से विचार एवं सुझाव आमंत्रित किए हैं। एआरसी की कार्य प्रणाली कुछ इस तरह है कि वे बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों से उनके फंसे कर्ज ले लेती हैं और इनकी वसूली कर लाभ अर्जित करती हैं। सामान्यत: एआरसी एक न्यास ढांचे के जरिये फंसी वित्तीय परिसंपत्तियां खरीदती हैं लेकिन वे उनका नियंत्रण अपने हाथों में न लेकर केवल उनका प्रबंधन करती हैं। एआरसी के गठन का तार 1991 में वित्तीय क्षेत्र में सुधार पर आई एक समिति की रिपोर्ट से जुड़ा है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर एम नरसिम्हन इस समिति के अध्यक्ष थे। आरबीआई ने फंसे कर्ज को वर्गीकृत करने के संबंध में जब पहला दिशानिर्देश जारी किया था तब यह समिति गठित हुई थी। हालांकि औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड को औद्योगिक क्षेत्रों की मुश्किलें दूर करने में बहुत सफलता हाथ नहीं लगी और ऋणों की त्वरित वसूली के लिए ऋण वसूली न्यायाधिकरण की स्थापना हुई। इसे भी इस कार्य में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद ही एआरसी की दिशा में पहल शुरू हुई।

तीन बैंकों ने 18 वर्ष पहले एक एआरसी की स्थापना की थी। इस समय देश में 28 एआरसी हैं लेकिन वे कुछ अधिक नहीं कर पाई हैं, न ही बैंकों के लिए और न ही स्वयं के लिए। वित्तीय परिसंपत्ति प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्गठन अधिनियम और प्रतिभूति सुरक्षा क्रियान्वयन अधिनियम, 2002 से एआरसी की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया था।

बैंक और एआरसी दोनों ने फंसी परिसपंत्तियों के समाधान में दिलचस्पी नहीं दिखाई है। कम से शुरुआती दिनों में फंसे ऋण के प्रबंधन पर जरूर ध्यान था। बैंक फंसा कर्ज बेचते हैं और उनके बदले उन्हें सिक्योरिटी रिसीट (एसआर) मिलती हैं। तय शर्तों के तहत फंसा ऋण खरीदते वक्त एआरसी को कम से कम 15 प्रतिशत नकदी जमा करनी होती है। बाकी रकम एसआर के माध्यम से भुगतान की जा सकती है। एआरसी को स्वयं 15 प्रतिशत एसआर खरीदनी होती हैं। अगस्त 2014 में यह सीमा 5 प्रतिशत थी। फंसी परिसंपत्तियां खरीदने में एआरसी की रुचि भी कम होती जा रही है। उनका कहना है कि एसआर में न्यूनतम निवेश की सीमा बढ़ाकर 15 प्रतिशत किए जाने से उनका उत्साह कमजोर पड़ गया है। उनका यह भी कहना है कि बैंक उनसे जितनी कीमत की उम्मीद रखते हैं फंसी परिसंपत्तियों का मूल्य कभी-कभी उतना होता भी नहीं है।

मेरे सुझाव

नकद लेनदेन को हमेशा तरजीह दी जाती है क्योंकि इससे बैंकों को एसआर भुनाने से जुड़ी अनिश्चितताओं से नहीं जूझना पड़ता है। एआरसी अग्रिम भुगतान कर भारी रियायत पर फंसी परिसंपत्तियां खरीद सकती हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए उनके पास रकम नहीं है। हालांकि इस प्रक्रिया में एसआर काफी महत्त्वपूर्ण है, इसलिए एसआर में एआरसी का निवेश 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जा सकता है।

एआरसी के लिए आवश्यक पूंजी भी बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिए इसे 5,000 करोड़ रुपये किया जा सकता है। इससे फं सी परिसंपत्तियां खरीदने की उनकी क्षमता में वृद्धि होगी। इससे यह सुनिश्चित करने में आसानी होगी कि एआरसी वसूली के बजाय समाधान पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं।

प्रतिभूतिकरण अधिनियम और ऋण शोधन अक्षमता संहिता के नियम एक समान बनाए जा सकते हैं। एआरसी को कंपनियों को पटरी पर लाने के लिए पूंजी डालने की अनुमति दी जानी चाहिए। वास्तव में अधिनियम में एआरसी को भुगतान में चूक करने वाले ग्राहकों के कारोबार में बदलाव करने, प्रबंधन अपने नियंत्रण में लेने और बिक्री या पट्टा पर लगाने की अनुमति दी गई है। हालांकि आरबीआई एआरसी को यह अधिकार देने में लंबा समय लगा रहा है और अगर दे भी रहा है तो किस्तों में।

सूचीबद्ध इकाइयां नहीं होने के बावजूद एआरसी के निदेशकमंडल में उचित संख्या में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति होनी चाहिए। एक पेशेवर प्रबंधन के साथ जवाबदेही, अनुपालन और संचालन के लिए एक स्वतंत्र अंकेक्षण एवं जोखिम प्रबंधन समिति भी होनी चाहिए।

एसआर का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए आरबीआई और पूंजी बाजार नियामक दोनों को एसआर के लिए द्वितीयक बाजार तैयार करना चाहिए। अस्तित्व में आए 18 वर्ष होने के बाद भी एसआर का कारोबार नहीं हो रहा है।

2019 में आरबीआई के एक कार्य दल ने उचित मूल्य हासिल करने के लिए परिसंपत्ति बिक्री के लिए ऑनलाइन माध्यम तैयार करने की सिफारिश की थी। इस दिशा में अब तक काम नहीं हो पाया है। एआरसी और अन्य इकाइयों के साथ अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंडों को फंसे ऋणों के लिए सीधी बोली लगाने की अनुमति मिलनी चाहिए।

फंसी परिसंपत्तियों की बिक्री से पहले ही उन्हें रिकवरी रेटिंग देने पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल छह महीने बाद यह रेटिंग दी जाती है। रिवकरी रेटिंग से किसी इकाई पर वित्तीय दावों और इन दावों की पूर्ति के लिए संभावित स्रोतों के बीच आपसी संबंधों का विश्लेषण करने में मदद मिलती है। एक बार जब मूल्य निर्धारण ऐसी रेटिंग पर होता है तो भारी छूट पर सौदा करने के बाद भी बैंकों को जांच एजेंसियों का डर नहीं सताएगा।

हमें एआरसी को सुदृढ़ बनाने की जरूरत है। छोटी एआरसी को विशेष रूप से फंसे खुदरा एवं एसएमई ऋण पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा जाना चाहिए, बड़ी एआरसी कंपनियों के ऋण खरीद कर उनका समाधान खोजने की जिम्मेदारी उठा सकती हैं।

अंत में एक प्रश्न: हम एआरसी के साथ सनसेट क्लॉज (एक निश्चित अवधि के बाद किसी व्यवस्था को समाप्त करने का प्रावधान) क्यों नहीं जोड़ सकते जब पूरी दुनिया में यह व्यवस्था लागू है?


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