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खुशनुमा मौसम का विज्ञान

विज्ञान विश्व से साभार


जब गौरैया चहकने लगें, पेड़ों की शाखाओं पर बौर खिलने लगे, तापमान न ज्यादा ठंडा और न ज्यादा गर्म होने लगे, गुनगुनी धूप, स्नेहिल हवा चलने लगे, प्रकृति हरियल चादर ओढ़ती दिखे, सुबह नशीली और रूमानी होने लगे, फूल खिलने लगें.. तो यूं समझिए ऋतुराज वसंत का आगमन हो चुका है. और फाल्गुन मास में वसंत के आगमन के साथ होता है होली का आगाज. होली रंगों, प्रेम, मस्ती, सद्भावना और मेलजोल का उत्सव है. यह त्यौहार जाति, भाषा और धर्म की सभी बाधाओं को तोड़ता है. यह त्यौहार वसंत ऋतु का स्वागत करता है और सर्दियों को गुडबाय कहता है. इसलिए इस पर्व को वसंतोत्सव और कामोत्सव भी कहा जाता है. यह त्यौहार अच्छी फसलों का भी प्रतीक है क्योंकि इस वक्त किसानों की फसलें पूरी तरह से पककर खेतों में लहलहा रहीं होती हैं.

यह एक बड़ी बिडंबना है कि आजकल होली खेलने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ज़्यादातर रंग मिलावटी या कृत्रिम हैं, जिनका हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर बेहद घातक प्रभाव पड़ता है. कृत्रिम रंग होली को बदरंग बनाकर रंग में भंग डालने का काम करते हैं. जबकि 19वी सदी से पहले यानी बाजार में कृत्रिम रंग और रंजक के आगमन से पहले हम होली का आनंद लेने के लिए पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों, झाड़ियों और फूल-पत्तियों से स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनुकूल तैयार किए रंगों का इस्तेमाल करते थे. देखा जाए तो सही मायनों में प्रकृति की गोद से लिए गए रंगों की फुहार से ही होली की असल पहचान है क्योंकि प्राकृतिक रंग स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए ही सुरक्षित हैं.

फिलहाल बाजार में होली मनाने के लिए रंगों के चार प्रकार आसानी से उपलब्ध हैं: गुलाल, सूखे पाउडर वाले रंग, पेस्ट और पानी में घुलने वाले रंग. ये सभी रंग अमूमन औद्योगिक रंजक (इंडस्ट्रियल डाइज़) होते हैं, जिन्हें तरह-तरह की अकार्बनिक मूल (इनओर्गेनिक ऑरिजिन) के रसायनों के साथ मिलाया जाता है. आपको जानकार यह ताज्जुब होगा कि होली के दौरान बाजार में बिकने वाले ज़्यादातर पक्के रंगों को ऐसे रसायनों या रंजकों से बनाया जाता है, जिनका निर्माण पेंट करने के लिए या रंगाई के मकसद से किया गया होता है!

आमतौर पर होली मनाने के लिए गुलाल को सबसे नरम और सुरक्षित रंग माना जाता है जबकि वास्तविकता कुछ और ही है. अगर हम प्रयोगशाला में गुलाल की बखिया उधेड़ें तो हमें इसके दो भाग दिखाई देंगे. पहला, एक पिग्मेंट जो आक्सीडाइजड हैवी मेटल है जैसे कैडमियन, क्रोमियम, आयरन, सीसा, मर्करी (पारा), निकेल, ज़िंक वगैरह. जबकि दूसरे भाग में एक बेस (आधार) दिखाई देगा जो एस्बेस्टॉक्स या सिलिका होता है, जिनमें रंग मिलाए जाते हैं. इसके अलावा अतिरिक्त चमक के लिए गुलाल में मिलाए गए रेत, माइका, स्टार्च, काँच के पाउडर भी दिखेंगे.

आज जिस तरह से लोग होली खेलते हैं वह भी बहुत खतरनाक है. अमूमन लोग गाढ़ा घोल तैयार करने के लिए सूखे रंगों में पानी की बेहद कम मात्रा का इस्तेमाल करते हैं. अक्सर जब यह घोल चेहरे पर पोता जाता है तो सूखे रंग में उपस्थित काँच के सूक्ष्म कण पीड़ित व्यक्ति के आँखों में चले जाते हैं, जिससे आँखों में दर्द, जलन या सूजन होता है. यह भी देखा गया है कि ज़्यादातर लोग सूखे रंगों या गुलाल को एक-दूसरे के चेहरे पर रगड़ते हैं. इसकी वजह से स्किन एलर्जी, खुजली, बालों में रूखापन और अस्थायी अंधापन भी हो सकता है.

हरे रंगों को बनाने के लिए कॉपर सल्फेट का इस्तेमाल होता है, जिससे खुजली, आंखों में लालिमा या सूजन के साथ ही अस्थायी या स्थायी नेत्रहीनता भी हो सकती है. इसी तरह, बैंगनी रंग में क्रोमियम आयोडाइड होता है जिससे गंभीर एलर्जी हो सकती है या अतिसंवेदनशील व्यक्ति में सांस से जुड़ी बीमारियाँ पैदा कर सकता है. चांदी जैसे दिखने वाले चमकीले रंगों में मौजूद एल्यूमीनियम ब्रोमाइड एक क़ैसरकारी पदार्थ है. होली के रंगों के कुछ और उदाहरण हैं: रोडामाइन बी (चमकीला लाल बैंगनी), मैलाकाइट ग्रीन सीरीज (हरा), मिथाइल वायलेट (बैंगनी), औरामाइन (पीला) और मिथाइल ब्ल्यू (नीला). इनमें से ज़्यादातर रंगों से हमारी त्वचा, आँखों, फेफड़ों, हड्डियों और शरीर के अन्य अंगों पर घातक प्रभाव पड़ते हैं.

लब्बोलुबाब यह है कि अकार्बनिक रंगों से होली खेलना बेहद घातक सिद्ध हो सकता है. इसलिए अक्सर देखा गया है कि रंगों और खुशियों का पर्व होली कई लोगों के लिए बदरंग और दुख:दायी हो जाता है. गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के अलावा, अकार्बनिक विषैले रंगों के इस्तेमाल के कई पर्यावरणीय प्रभाव भी हैं. होली के रंगों को बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले ज़्यादातर रसायन जैव निम्नीकरणीय नहीं होते हैं, इसलिए इन्हें धोने पर भी इनके अवशेष पानी के स्रोतों और मिट्टी में दाखिल हो जाते हैं. जिसकी वजह प्रदूषण उत्पन्न होता है. इसलिए हमें कृत्रिम और आकार्बनिक रंगों से होली खेलने से बचना चाहिए.

सवाल उठता कि अगर हम कृत्रिम और आकार्बनिक रंगों का इस्तेमाल न करें तो होली मनाएँ कैसे? होली बेशक खेली जानी चाहिए लेकिन रंग प्राकृतिक हों और आपके स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इनका दुष्प्रभाव न हो तो रंग में भंग होने की बजाए असली होली का असली आनंद लिया जा सकता है. दरअसल भारत में प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की बहुत ही प्राचीन परंपरा रही है. प्राचीन भारतीय वाङ्ग्मय और साहित्य में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है कि किस तरह से पलाश, गुलाब, हल्दी, केसर, मेहंदी, चुकंदर, गेंदा, पारिजात, गुलमोहर, आंवला, अंगूर, नीम, कुमकुम, नील और केशु जैसे प्राकृतिक स्रोतों से होली खेलने के लिए रंग तैयार किए जाते थे.

विषैले कृत्रिम रंगों से बचने के लिए सबसे अच्छा विकल्प पौधों के विभिन्न भागों जैसे फूल, पत्ते, तन और फल से तैयार प्राकृतिक रंगों से होली खेलना है. आज बाजार में कृत्रिम रंगों की भरमार है, लेकिन बाजार में प्राकृतिक रंगों को आधार बनाकर तैयार किए गए हर्बल गुलाल और रंगों के सैकड़ों शेड्स भी उपलब्ध हैं, जो एक आदर्श विकल्प मुहैया कराता है. सही मायनों में प्रकृति की गोद से लिए गए रंगों की फुहार से ही होली की असल पहचान है क्योंकि प्राकृतिक रंग सेहत और पर्यावरण दोनों के लिए सही हैं. आइए, इस बार हम सुखद, सुरक्षित और पर्यावरण हितैषी होली मनाएँ. अस्तु!


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