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गुरुत्वाकर्षण पर लेख

क्या गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force)सिर्फ एक भ्रम है?-अर्पित द्विवेदी


विज्ञान विश्व से साभार

गुरुत्वाकर्षण बल को हम अपने दैनिक जीवन में हर पल अनुभव करते हैं। यही कारण है कि चीजें हमेशा नीचे गिरती हैं। यही कारण है कि चीजों में भार होता है। और यही कारण है कि हम अपने फ्लैट की खिड़की से छलांग नहीं लगा देते, क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा किया तो शरीर का कचूमर निकलना तय है। दैनिक जीवन के अनुभवों के आधार पर गुरुत्वाकर्षण बल को भ्रम कहना कुछ ऐसा है जैसे कोई इस पूरी स्रष्टि को ही भ्रम कहे। वैसे दर्शनशास्त्र में तमाम ऐसे तर्क हैं जो इस जगत को भ्रम बतलाते हैं। लेकिन चिंता मत कीजिये मैं आपको किसी दार्शनिक आध्यात्मिक जलेबियों में उलझाने नहीं जा रहा हूँ। मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतः विज्ञानसम्मत है।


लम्बे अरसे से ये सवाल लोगों को परेशान करता था कि आखिर चीजें नीचे क्यों गिरती हैं? अरस्तू ने इसका समाधान देते हुए कहा कि हर पदार्थ अंततः अपने मूल स्थान को वापस लौट आता है। ठोस चीजों का सम्बन्ध धरती से है तो वे धरती पर गिर जाती हैं। पानी पर्वत, झरने, नदियों से होता हुआ अंततः समुद्र में लौट जाता है। और धुआं हमेशा ऊपर उठकर वायु में मिल जाता है। ये समाधान कई सदियों तक लोगों को संतुष्ट करता रहा जब तक कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज नहीं की। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण को दो पिंडों के बीच लगने वाले एक बल की तरह परिभाषित किया। पिंडों का द्रव्यमान जितना ज्यादा गुरुत्वाकर्षण भी उतना ही ज्यादा। लेकिन एक सवाल अब भी अनउत्तरित ही रहा कि आखिर यह बल पैदा किस प्रकार होता है?


आइंस्टीन जब अपने ऑफिस में थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी पर काम कर रहे थे जो कि एक बहुमंजिला इमारत में था तो उन्हें एक जबरजस्त विचार आया। उन्होंने सोचा कि यदि बिल्डिंग के शीशों को साफ़ करने वाला यदि अपने प्लेटफार्म से गिर जाए तो वह तुरंत ही अपने आप को भारहीन अवस्था में पायेगा, ठीक उसी तरह जैसे सुदूर अन्तरिक्ष में अपने यान में मौजूद कोई अंतरिक्षयात्री। आखिर इन दोनों की अवस्था में क्या अंतर है? धरती पर किसी ऊँचे स्थान से गिर रहे व्यक्ति और अन्तरिक्ष में अपने यान में मौजूद अंतरिक्षयात्री की भारहीन अवस्था में क्या फर्क है? आइंस्टीन का कहना था कि दोनों की अवस्था में कोई फर्क नहीं है। दोनों ही पर कोई गुरुत्वाकर्षण बल कार्य नहीं कर रहा क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल जिसे एक आकर्षित करने वाले बल की तरह परिभाषित किया जाता है जैसा कुछ है ही नहीं।


लेकिन आप सोच सकते हैं कि यदि ऐसा है तो फिर बिल्डिंग से गिरने वाला व्यक्ति नीचे क्यों गिर रहा है? आखिर वो क्या है जो उसे नीचे गिरा रहा है? आइंस्टीन का कहना था कि वह नीचे गिर रहा है क्योंकि वह एक कर्व्ड स्पेस टाइम में है। धरती जैसे किसी भारी पिंड पर मौजूद चीजें नीचे गिरती हैं क्योंकि धरती का द्रव्यमान स्पेस-टाइम में कर्व पैदा करता है।


कर्व्ड स्पेस टाइम चीजों को कैसे प्रभावित करता है इसे ऐसे समझिये। हम जानते हैं कि धरती की सतह कर्व्ड है। मान लीजिये आप और आपका एक मित्र भूमध्य रेखा पर अलग अलग देशांतर रेखाओं पर मौजूद हैं। अब आप दोनों यहाँ से एक ही रफ़्तार से एकदम सीधी रेखा में उत्तरी ध्रुव की ओर सफर करते हैं। जैसे जैसे आप आगे बढ़ते जायेंगे आप दोनों पास आते जायेंगे बावजूद इसके कि आप एकदम सीधी रेखा में चल रहे हैं और आप दोनों के बीच कोई आकर्षण बल भी कार्य नहीं कर रहा। लेकिन फिर भी आप दोनों पास आते आते आखिरकार उत्तरी ध्रुव पर पहुंचकर मिल जायेंगे।


लेकिन यहाँ कोई पूछ सकता है कि दोनों मित्र उत्तरी ध्रुव पर मिल सके क्योंकि वो दोनों एक कर्व्ड सरफेस पर एक ही रफ़्तार से एक सीधी रेखा में गतिमान थे। लेकिन धरती पर मौजूद चीजें तो कहीं किसी दिशा में गतिमान नहीं होतीं फिर वे क्यों धरती की ओर गिरती हैं? तो इसका जवाब है कि यदि कोई पिंड स्पेस में एकदम गतिहीन अवस्था में भी है तो भी वह स्पेस-टाइम में हर समय गतिमान है। लेकिन यदि ऐसा है तो हमें ये गति अनुभव में क्यों नहीं आती?


इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो यह कि गति कोई भी हो हमेशा रिलेटिव यानी सापेक्ष होती है। आप कार में 60km/hr की रफ़्तार से चल रहे हैं। आपकी यह गति धरती पर किसी बिंदु को फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस मानकर है। धरती अपने परिक्रमा पथ पर सूर्य का चक्कर लगा रही है यहाँ यह गति सूर्य के सापेक्ष है। सूर्य मिल्की-वे के केंद्र का चक्कर लगा रहा है यहाँ ये गति मिल्की-वे के केंद्र के सापेक्ष है। कल्पना कीजिए आप अपने अन्तरिक्ष यान में स्पेस में किसी ऐसी जगह पर हैं जहाँ दूर दूर तक कोई पिंड नहीं है। आप कैसे पता करेंगे कि आपका यान किस गति से गतिमान है?


और दूसरा कारण है कि स्पेस-टाइम (इसे केवल स्पेस समझने की भूल न करें) एक 4-D स्ट्रक्चर है। जबकि हम अपनी इन्द्रियों से 3-D यानी त्रिआयामी दुनिया को ही अनुभव करने में समर्थ हैं। एक 4-D दुनिया कैसी होती है हमें इसका जरा भी अंदाजा नहीं है। जिस तरह एक अंधे व्यक्ति को प्रकाश के बारे में नहीं समझाया जा सकता वैसे ही त्रिआयामी दुनिया के जीव को 4-D दुनिया कैसी होती है नहीं समझा सकते। यूँ समझिये जैसे 2-D दुनिया के जीव को किसी ग्लोब पर छोड़ दिया जाए। वह कभी समझ नहीं पायेगा कि वह बार बार घूमकर वापस उसी जगह कैसे आ जाता है। क्योंकि ग्लोब जैसे त्रिआयामी स्ट्रक्चर का उसे कोई अनुभव नहीं है।


हो सकता है आपको ये सब कल्पना से परे लग रहा हो। आप ही ऐसे एकलौते नहीं हैं। जब आइंस्टीन ने अपनी थ्योरी को दुनिया के सामने रखा था तो आम आदमी की तो छोड़िये दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों को भी ऐसा ही लगा था। तब आइंस्टीन ने अपनी थ्योरी को टेस्ट करने का तरीका भी उनको बताया।


जैसा कि हम जानते हैं कि प्रकाश एक सीधी रेखा में चलता है। आइंस्टीन का कहना था कि यदि वास्तव में द्रव्यमान या उर्जा के कारण स्पेस-टाइम में कर्व पैदा होते हैं तो किसी भारी द्रव्यमान वाले पिंड के पास से गुजरने वाले प्रकाश को अपने पथ से विचलित होना चाहिए। हमारे सबसे पास में भारी द्रव्यमान वाला एकमात्र पिंड सूर्य है। तो यदि सूर्य के आकाशीय मार्ग पर मौजूद तारों की वास्तविक स्थिति और सूर्य के उनके प्रकाश के रास्ते में आने के बाद की स्थिति की तुलना करें तो वे तारे अपनी वास्तविक स्थिति से कुछ अंश विचलित प्रतीत होने चाहिए। लेकिन इसमें समस्या एक थी कि सूर्य की तेज चमक के कारण बैकग्राउंड में मौजूद तारों को देख पाना असंभव था। इसके लिए जरुरी था कि सूर्य के प्रकाश को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया जाए। सौभाग्य से प्रकृति स्वयं पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान हमें ऐसा अवसर देती है।


19 मई 1919 को एक पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान कई वैज्ञानिकों ने फोटोग्राफिक प्लेट पर सूर्य के बैकग्राउंड में मौजूद तारों को कैद किया। बाद में जब इनकी वास्तविक स्थिति की गणना की गयी तो जितने विचलन की भविष्यवाणी आइंस्टीन ने अपनी थ्योरी के माध्यम से की थी वे अपनी स्थिति से उतने ही विचलित पाए गए। इस प्रयोग ने आइंस्टीन की थ्योरी की प्रमाणिकता पर मुहर लगा दी। और इस तरह आइंस्टीन ने हमें न केवल गुरुत्वाकर्षण बल्कि इस दुनिया को समझाने का भी एकदम नया नज़रिया दे दिया।

Arpit Dwivedi

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