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जीव ,ब्रह्म नहीं होता,ब्रह्म में होता है-डॉ आनंद प्रदीक्षित

उपनिषद कहते हैं कि प्रेम सीखो।सब अपने मोह में पड़े हैं और अपने को प्रेम करते हैं पर वह सिर्फ मोह है। प्रेम तो तभी हो सकता है, जब दूसरा भी अपना ही मालूम पड़े। प्रेम तो तभी हो सकता है, जब आदि शक्ति माँ शुभ्रांगिनी का अनुभव हो, अन्यथा नहीं हो सकता है। प्रेम केवल वे ही कर सकते हैं, जो वे नहीं रह गए जो वे दिखते हैं।जो नहीं बचे,खाली हो गए, वे ही प्रेम कर सकते हैं। जो हैं, बचे हैं, प्रकट हैं ,भौतिक हैं,वे सिर्फ मोह ही कर सकते हैं। प्रेम तो मिटने का रास्ता है। प्रेम तो पिघलना है। इसलिए प्रेम वह नहीं कर सकता, जिसको अपने को बचाना है।सर्वाइवल हो कर फिटेस्ट कहला सकते हैं ,प्रेम नहीं कर सकते।

कोरोना से संक्रमित पति की देखभाल करती पत्नी प्रेम में है,वो सरवाइवल नहीं चाहती।ये तो टाइटेनिक की स्वार्थी भौतिकवादी हीरोइन ही कर सकती थी ,प्रेमी को डूबते देखती निष्ठुर निकृष्ट क्रूर औरत,प्रेम नहीं करती।प्रेम तो वो होता कि साथ डूब जाती।

वो तो शारीरिक मोह की गुलाम औरत थी,वासना की पुतली।

जितना कोई जीवन को बचाने की चेष्टा में रत होगा, उतना प्रेम शून्य हो जाएगा।

कृष्ण कहते हैं, जब मोह पिघल जाता है अर्जुन, तो व्यक्ति मेरे साथ एकाकार हो जाता है; सच्चिदानंद सम्पूर्ण हो जाता है। फिर भेद नहीं रह जाता।

लेकिन यह घोषणा मन प्राणों से उठनी चाहिए, स्वर से नहीं। तत्वमसि,तू ही है, यह घोषणा प्राणों से आनी चाहिए, कंठ से नहीं। यह घोषणा हृदय से आनी चाहिए, मस्तिष्क से नहीं। यह घोषणा रोएं-रोएं से आनी चाहिए।तब उस क्षण में जीव ब्रह्म एक हो जाएंगे।जीव माँ की गोद में सो जाएगा।

शिशु माँ नहीं हो जाएगा ,मां में मिल जाएगा।

अद्वैत ये ही है,अहम ब्रह्मास्मि नहीं है।

जीव ब्रह्म न हो सकेगा पर ब्रह्म में समा कर अनुनादित हो जाएगा

©डॉ आनंद प्रदीक्षित


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