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डॉ भीमराव आंबेडकर के विचार

डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारतीय इतिहास के ऐसे एकलौते व्यक्ति हैं, जिन्होंने दलितों और वंचितों को सामाजिक अध‍िकार दिलाने के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनकी बातें आज भी पीडि़तों और वंचितों के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं। आइए जानते हैं उनके प्रेरक एवं अनमोल विचार: हम आदि से अंत तक भारतीय हैं। महात्मा आये और चले गये परंतु अछुत, अछुत ही बने हुए हैं।

जो क़ौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह क़ौम कभी भी इतिहास नहीं बना सकती।


बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए।

किसी का भी स्वाद बदला जा सकता है, लेकिन ज़हर को अमृत में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।


भाग्य में नहीं, अपनी शक्ति में विश्वास रखो। जो व्यक्ति अपनी मौत को हमेशा याद रखता है, वह सदा अच्छे कार्य में लगा रहता है।


सागर में मिलकर अपनी पहचान खो देने वाली पानी की एक बूंद के विपरीत, इंसान जिस समाज में रहता है, वहां अपनी पहचान नहीं खोता।


मैं रात भर इसलिये जागता हूं क्योंकि मेरा समाज सो रहा है।


जीवन लम्बा होने की बजाय महान होना चाहिए। सामान्यतः कोई स्मृतिकार कभी ये बात नहीं बताता कि आपके सिद्धांत क्यों हैं और कैसे हैं।


हम सबसे पहले और अंत में भारतीय हैं।


इंसान सिर्फ समाज के विकास के लिए नहीं पैदा हुआ है, बल्कि स्वयं के विकास के लिए पैदा हुआ है।


उदासीनता लोगों को प्रभावित करने वाली सबसे खराब किस्म की बीमारी है।


गुलाम बन कर जिओगे, तो कुत्ता समझ कर लात मारेगी ये दुनिया। नवाब बन कर जिओगे तो शेर समझ कर सलाम ठोकेगी।


एक इतिहासकार, सटीक, ईमानदार और निष्पक्ष होना चाहिए।


न्याय हमेशा समानता के विचार को पैदा करता है।


हर व्यक्ति जो 'मिल' के सिद्धांत कि ‘एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता’ को दोहराता है उसे ये भी स्वी कार करना चाहिए कि ‘एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर सकता’। एक सुरक्षित सेना एक सुरक्षित सीमा से बेहतर है।


जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते, तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है, वह आपके किसी काम की नहीं होती।


मैं किसी समुदाय की प्रगति को महिलाओं ने जो प्रगति हांसिल की है उससे मापता हूं।


पति-पत्नी के बीच का सम्बन्ध किसी गहरे दोस्तों के सम्बन्ध के समान होने चाहिए। जाति कोई ईंटों की दीवार या कोई काँटों का तार नहीं है, जो हिंदुओं को आपस में मिलने से रोक सके। जाति एक धारणा है, जो मन की एक अवस्था है।


मैं किसी समुदाय की प्रगति महिलाओं ने जो प्रगति हासिल की है, उससे मापता हूँ।


बुद्धि का विकास मनुष्य के प्रगति का आखिरी लक्ष्य होना चाहिए।


एक महान आदमी एक आम आदमी से इस तरह से अलग है कि वह समाज का सेवक बनने को तैयार रहता है।


जीवन लम्बा होने के बजाय महान होना चाहिए।


जिस तरह मनुष्य नश्वर है, ठीक उसी तरह विचार भी नश्वर हैं। जिस तरह पौधे को पानी की जरूरत पड़ती है, उसी तरह एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरुरत होती है। वरना दोनों मुरझा कर मर जाते हैं।


मैं राजनीति में सुख भोगने नहीं बल्कि अपने सभी दबे-कुचले भाईयों को उनके अधिकार दिलाने आया हूं।


मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्छा है, मेरे बताए हुए रास्ते पर चलें। इतिहास गवाह है कि जहां नैतिकता और अर्थशाश्त्र के बीच संघर्ष होता है, वहां जीत हमेशा अर्थशाश्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल ना लगाया गया हो।

संविधान एवं अध‍िकार (Ambedkar Quotes in Hindi)


संविधान, यह एक मात्र वकीलों का दस्तावेज नहीं, यह जीवन का एक माध्यम है।


एक सफल क्रांति के लिए सिर्फ असंतोष का होना ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है।


राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। और जो सुधारक समाज की अवज्ञा करता है वह सरकार की अवज्ञा करने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी है।


राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाये।


यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं, तो सभी धर्मों के शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए।


समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना होगा। हमें अपने पैरों पर खड़े होना है, अपने अधिकार के लिए लड़ना है, तो अपनी ताकत और बल को पहचानो। क्योंकि शक्ति और प्रतिष्ठा संघर्ष से ही मिलती है।


यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरूपयोग किया जा रहा है, तो मैं इसे सबसे पहले जलाऊंगा।

यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए।

हमारे पास यह आज़ादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेद-भाव और अन्य चीजों से भरी हैं जो हमारे मौलिक अधिकारों की विरोधी हैं।


कानून और व्यवस्‍‍था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।


जब तक आप सामाजिक स्ववतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी हैं।


निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है, जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्तव बल ना लगाया गया हो।


एक सफल क्रांति के‍ लिए सिर्फ असंतोष का होना पर्याप्त नहीं है, जिसकी आवश्याकता है वो है न्याय एवं राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था।


राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। और एक सुधारक जो समाज को खारिज कर देता है, वो सरकार को खारिज कर देने वाले राजतीतिज्ञ से कहीं अधिक साहसी है।


कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़ जाय तो दवा जरुर देनी चाहिए।

धर्म एवं विश्वास (Ambedkar Quotes in Hindi)

धर्म और गुलामी असंगत हैं। जो धर्म जन्म से एक को 'श्रेष्ठ' और दूसरे को 'नीच' बनाए रखे, वह धर्म नहीं, गुलाम बनाए रखने का षड़यंत्र है।

मनुष्य एवं उसके धर्म को समाज के द्वारा नैतिकता के आधार पर चयन करना चाहिये। अगर धर्म को ही मनुष्य के लिए सब कुछ मान लिया जायेगा, तो किन्हीं और मानकों का कोई मूल्य ही नहीं रह जायेगा।

धर्म में मुख्य रूप से केवल सिद्धांतों की बात होनी चाहिए, यहां नियमों की बात नहीं हो सकती।

मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।


लोग और उनके धर्म सामाजिक मानकों द्वारा सामाजिक नैतिकता के आधार पर परखे जाने चाहिए। अगर धर्म को लोगों के भले के लिए आवशयक मान लिया जायेगा, तो और किसी मानक का मतलब नहीं होगा।


मनुवाद को जड़ से समाप्त करना मेरे जीवन का प्रथम लक्ष्य ह

कुछ लोग सोचते हैं कि समाज के लिए धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं इस विचार को नहीं मानता। मानव जीवन के लिए धर्म की स्थापना होना बेहद जरुरी है।


हिंदू धर्म में, विवेक, कारण और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई स्कोप नहीं हैं।


मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे। मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूं।


मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।


हालांकि, मैं एक हिंदू पैदा हुआ था, लेकिन मैं सत्य निष्ठा से आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं।


आज भारतीय दो अलग-अलग विचारधाराओं द्वारा शासित हो रहे हैं। उनके राजनीतिक आदर्श जो संविधान की प्रस्तावना में इंगित हैं, वो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारे को स्थापित करते हैं, किन्तु उनके धर्म में समाहित सामाजिक आदर्श इससे इनकार करते हैं।

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