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त्रिया चरित्र से पहले स्वयं का चरित्र सुधारें©डॉ आनंद प्रदीक्षित

Updated: Apr 11, 2021

पुरुष सदा से स्त्री का चरित्र समझने में लगा हुआ है और जब नहीं समझ पाता तब कह देता है कि" त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम "

मैं कहता हूं कि समझने की आवश्यकता ही क्या है?वह समझना इसलिए चाहता है जिससे कि उस पर शासन कर सके .समझ लेंगे तो शासन करना आसान हो जाएगा इसलिए मैं कभी समझना नहीं चाहता क्योकि मुझे शासन नहीं सहभागिता पसंद है।

रही बात रहस्य की तो कुछ बातें रहस्य के पर्दे में ही अच्छी लगती है ।इससे बहुत से सरप्राइस मिलते रहते हैं और इस में ही जीवन का आनंद है ।जब हम आशा करते हैं कि स्त्री इस समय यह कहेगी और तब वह कुछ और कहती है तो यह बहुत ही कुतूहल और आनंद का विषय है। न कि चिढ़ने का विषय ।

हमारे संबंधों में बहुत सी स्त्रियां जन्म से मृत्यु तक आती है ।

मां बहन प्रेमिका बेटी पत्नी बहू इत्यादि के रूप में और उनसे हमें आजीवन स्नेह प्रवाह प्रेम समर्पण सब मिलता है इससे ज्यादा और समझने की जरूरत क्या है ?उनका चरित्र समझने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनका चरित्र यदि कोई बिगाड़ता है तो वह पुरुष ही है ।वह उनका चरित्र इसलिए समझना चाहता है कि जिससे उन्हें बिगाड़ने में आसानी रहे क्योंकि सामने वाले का पूर्ण ज्ञान होने पर ही उसे फंसाया जा सकता है और दास बनाया जा सकता है। वह स्त्री की शक्ति समझना चाहता है वह उसे शक्ति स्वरूपा देवी भी कहता है और आराधना करने के लिए मंदिर में बैठा के कैद कर लेता है ।तरह-तरह की कविताएं पढ़ी जाती है "अबला जीवन हाय तुम्हारी" इसी प्रकार यत्र नार्यस्तु पूज्यंते प्रकार की बातें भी कही जाती हैं लेकिन वह पूजना नहीं स्वयं को पुजवाना चाहता है और हमारे त्यौहार इसके उदाहरण हैं ।

कोई एक त्यौहार ऐसा बता दीजिए जिसमें हम स्त्री को सम्मान देते हो ।चलो माता को ही सम्मान दे दो बहन भाई के त्यौहार में तो बराबर की बात है ,वहां पर कोई विशेष सम्मान की बात नहीं की जा रही क्योंकि भाई बहन की रक्षा का वचन देता है।मैं पुरुष हूं बलवान हूं तुम कमजोर हो कमजोर ही रहना जिससे कि मैं इस बंधन को साल भर याद करूं और तुम्हारी रक्षा करता रहूं अगले साल फिर नवीनीकरण करा देना ।

यह भी कहा गया शास्त्रों में कि बचपन में पिता रक्षा करता है युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र ।इन सारी अवस्थाओं में कोई स्त्री स्त्री की रक्षा क्यों नहीं कर सकती यह सब केवल पुरुषों को प्रचारित करने की बातें हैं।

अब ये बन्द क्यों नहीं होता ?

पर बराबरी के नाम पर कुछ पुरुषों का उत्पीड़न तो न हो।अतीत का बदला लेने से वर्तमान बदलता नहीं,बिगड़ता है


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