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दूसरी लहर पर

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बारे में पांच बिंदु

(मिहिर शर्मा )

(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड )



देश में तबाही मचाने वाली कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बारे में हम क्या जानते हैं? और क्या हम इसके लिए जिम्मेदारी तय कर सकते हैं? महामारी के कारण मची अफरातफरी में इन सवालों के जवाब तलाश करना आसान नहीं है। परंतु एक बार यह लहर धीमी पडऩे के बाद इन सवालों के जवाब तलाशना जरूर आसान हो जाएगा।


देश में आंकड़ों की कमी और मीडिया तथा सरकारी रुख को अकाट्य सत्य के रूप में प्रस्तुत किए जाने की प्रवृत्ति के कारण यह महत्त्वपूर्ण है कि उन बातों के विश्लेषण से शुरुआत की जाए जिनसे हम आज गुजर रहे हैं।


दूसरी लहर की मौजूदा स्थिति के बारे में तीन बातें इस प्रकार हैं: पहली बात, हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत एक बड़ा मुल्क है और यह लहर अलग-अलग समय पर देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचेगी। शहरी महाराष्ट्र इस लहर की चपेट में सबसे पहले आया और वहां के मामले सबसे पहले उजागर हुए। संभावनाएं हैं कि ऐसा वायरस के नागपुर वाले स्वरूप यानी बी.1617 के प्रसार से हुआ। हमारे पास जो सीमित आंकड़े हैं वे यही बताते हैं कि मुंबई और दक्षिण में इसी प्रकार के वायरस का प्रकोप रहा। दिल्ली में अभी भी ब्रिटेन वाला स्वरूप बी.117 प्रभावी है और यह अब बेंगलूरु में भी फैल रहा है। वहां यह अपने चरम पर पहुंच रहा है और इस बार वहां संक्रमण दिल्ली और मुंबई से भी खराब स्थिति में है। इससे एक नीतिगत सबक तो यही निकलता है कि सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में ऑक्सीजन आदि की उपलब्धता की जो व्यवस्था बनाई जा रही है उसे इतना लचीला बनाया जाए कि वह जरूरत के मुताबिक अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित की जा सके। अगले महीने शायद ऑक्सीजन से भरी ट्रेनों की जरूरत उत्तर में नहीं बल्कि दक्षिण पूर्वी तट या असम में होगी।


दूसरी बात, अब यह सुनिश्चित हो चुका है कि महामारी मीडिया कवरेज से दूर रहने वाले दूरदराज इलाके यानी गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक में पैठ बना चुकी है। रिपोर्टों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के बड़े इलाकों में पहले से कमजोर स्वास्थ्य सुविधा ढांचा अब पूरी तरह चरमरा चुका है। उत्तर भारत के कुछ ग्रामीण इलाकों में कोविड-19 के लक्षणों को बस सामान्य बुखार माना जा रहा है और बचाव के लिए कोई खास उपाय नहीं किए जा रहे हैं। यह व्यापक पैमाने पर संचार की कमी का मामला है। क्योंकि महामारी को आए तो एक वर्ष से अधिक वक्त हो चुका है। इन दिक्कतों को तत्काल हल करना होगा।


तीसरी बात, महानगरीय भारत में महामारी से जुड़े आंकड़ों से यही पता लग रहा है कि अस्पतालों में जगह नहीं है। महानगरों से बाहर तो यह भी पता लगाने का कोई जरिया नहीं है। 'द फाइनैंशियल टाइम्स' का अनुमान है कि कुछ शहरी इलाकों में मौत का वास्तविक आंकड़ा आधिकारिक आंकड़ों का 10 गुना तक है, जबकि 'द वॉशिंगटन पोस्ट' के अनुसार यह 20 गुना तक अधिक है। ऐेसे में बेहतर यही है कि प्रति 10 लाख आबादी पर कुल मामले, कुल मौत जैसे आंकड़ों पर बहुत जोर नहीं दिया जाए। एक लचीली और प्रतिक्रिया देने वाली सरकार अन्य तरह के आंकड़ों का इस्तेमाल करेगी। इसमें सोशल मीडिया पोस्ट से लेकर यादृच्छिक सामूहिक परीक्षण तक सभी शामिल हो सकते हैं। इनकी मदद से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों का पता लगाया जा सकता है।


अब दो ऐसे बिंदुओं पर बात करते हैं जो जिम्मेदारी से संबंधित हैं:


पहली बात यह कि इस लहर के बारे में पहले से अनुमान लगाना संभव था। हमें यह बात पता है क्योंकि वास्तव में अनुमान लगाया गया था: रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक वायरस के विभिन्न प्रकार का पता लगा रहे सरकार के विशेषज्ञ समूह ने खुद ऐसा किया था। अर्थशास्त्री शमिका रवि ने फरवरी में ही कह दिया था कि हम मामलों में तेजी के शुरुआती चरण में हैं। मार्च के आरंभ में उन्होंने कह दिया था कि दूसरी लहर आसन्न है। तबस्सम बडऩगरवाला ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में लिखा था कि फरवरी में महाराष्ट्र के दूरदराज इलाकों में मामले सात गुना बढ़ गए हैं। इसके तुरंत बाद बीबीसी के सौतिक विश्वास ने बताया था कि मामलों में यह बढ़ोतरी एक नए स्वरूप वाले वायरस की वजह से हो रही है। दिसंबर के मध्य में ही गणितज्ञ मुराद बानाजी ने चेतावनी दे दी थी कि सीरो सर्वे तथा अन्य आंकड़ों से यह नतीजा न निकाला जाए कि भारत में दूसरी लहर नहीं आएगी। दिसंबर 2020 से मार्च 2021 तक जो खुलापन देखने को मिला उसके लिए कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता।


दूसरा, केंद्र और राज्य सरकारें जिम्मेदारी साझा करती हैं। केंद्र अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह त्याग बैठा है। पाखंड और कायरता का आलम यह है कि वह पिछले वर्ष के कड़े लॉकडाउन का बचाव करता है और यह दावा भी करता है कि आज जबकि हालात बहुत अधिक खराब हैं, तब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाना असंभव है। यदि उसका मानना है कि पिछले देशव्यापी लॉकडाउन की कीमत चाहे वह मानव जीवन के रूप में हो, आर्थिक हो या राजनीतिक, वह इतनी अधिक थी कि उसके बदले अब बिना लॉकडाउन के लाखों जाने गंवाना उचित है तो यह उसकी ईमानदारी ही होगी। इस बीच राज्य सरकारों ने अलग-अलग तरह का प्रदर्शन किया है। महाराष्ट्र ने दूसरी लहर का सबसे पहले सामना किया और अब लग रहा है कि वह औरों से बेहतर तरीके से निपटने में कामयाब रहा। दिल्ली में कोई प्रशासन नहीं दिख रहा। शीला दीक्षित के जाने के बाद से ही वहां एक किस्म की अराजकता नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश की हालत सबसे अधिक खराब है क्योंकि उसने न केवल वास्तविक आंकड़े छिपाए हैं बल्कि ऑक्सीजन की मांग कर रहे अस्पतालों और मरीजों पर बल प्रयोग भी किया है।

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