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धूमिल हुई प्रतिष्ठा -बिज़नेस स्टैण्डर्ड

देश में कोविड-19 संक्रमण के लगातार बढ़ते मामले और विभिन्न इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं पर लगातार बढ़ते दबाव ने न केवल एक बड़ी मानवीय त्रासदी को जन्म दिया है बल्कि इसने वैश्विक व्यापार और एक सॉफ्ट पावर(आपसी सहयोग से वांछित परिणाम पाने की ताकत) के रूप में भारत की छवि को भी क्षति पहुंचाई है। भारत दुनिया के सर्वाधिक अहम उद्योगों को श्रम और वस्तुएं मुहैया कराने में शामिल रहा है। ऐसे ही उद्योगों में से एक जहाजरानी उद्योग स्वेज नहर में सप्ताह भर लंबी बाधा से बस उबरा ही है। लेकिन अब चालक दल के भारतीय सदस्य (तथा अन्य देशों के सदस्य भी जो भारतीय चालक दल के साथ जहाज पर हैं या जो भारतीय बंदरगाहों पर रुके हैं) वे कोविड-19 संक्रमित हैं। रहने की तंग जगहों वाले ऐसे वाणिज्यिक जलपोत पर सभी लोग संक्रमित हो सकते हैं। हाल ही में भारत से दक्षिण अफ्रीका पहुंचे पोत पर ऐसा ही हुआ और चालक दल के 14 फिलीपीनी सदस्य कोविड संक्रमित निकले। परिणामस्वरूप एशिया के नौवहन केंद्र माने जाने वाले सिंगापुर समेत कई बंदरगाहों ने उन जलपोतों पर चालक दल के सदस्यों की अदलाबदली से मना कर दिया है जिनमें भारतीय कर्मी शामिल हैं। कुछ देश तो भारत से आने वाले पोतों को अपने तट पर आने ही नहीं दे रहे। यानी भारत में महामारी पर नियंत्रण नहीं कर पाने का उसकी आपूर्ति शृंखला पर व्यापक असर हो रहा है।

कुछ अन्य क्षेत्र भी ऐसे ही प्रभावित होंगे। उदाहरण के लिए भारतीय कपड़ा एवं वस्त्र निर्यातकों को कई जगह कुल क्षमता से आधी के साथ काम करना पड़ रहा है। ऐसे में उन्हें समय पर अनुबंध पूरे कर पाने में समस्या हो रही है। कुछ अनुमानों के मुताबिक गत वर्ष वस्त्र निर्यात में एक चौथाई की गिरावट आई थी। वैश्विक बैंक और अंकेक्षण फर्मों की बैक ऑफिस और ऑनलाइन सेवाएं प्रभावित हुई हैं क्योंकि उनके भारतीय कर्मचारी या संविदाकार संक्रमित हो गए हैं। ऐसे में अपनी कई सेवा जरूरतों के लिए उन्होंने भारत से बाहर का रुख किया है। यह घटनाक्रम इन क्षेत्रों में भारत की संभावनाओं को लंबे समय का नुकसान पहुंचा सकता है। किसी भी क्षेत्र में संविदा न निभा पाने को उन सभी भारतीय कंपनियों के लिए खतरे के रूप में देखा जाना चाहिए जो वैश्विक बाजारों से संबद्ध हैं। अनुबंध भंग होने का असर तब और बढ़ जाता है जब दुनिया के कई देश भारत से उन टीकों के आगमन की प्रतीक्षा में हैं जिनका उनसे वादा किया गया था। इससे भारत की उस सॉफ्ट पावर को नुकसान पहुंचा है जो टीका मैत्री से होने वाले संभावित लाभों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।


भारतीय व्यवस्था और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लाजिमी हैं। उदाहरण के लिए अप्रैल के मध्य में हॉन्ग कॉन्ग ने उस समय भारत से आने और भारत जाने वाली उड़ानों पर रोक लगा दी जब दिल्ली से वहां पहुंची एक उड़ान पर दर्जनों यात्री संक्रमित मिले। ध्यान रहे इन सभी के पास कोविड निगेटिव रिपोर्ट थी। जाहिर है इससे अन्य देशों को यही लगा कि भारत की निगरानी और नियंत्रण प्रक्रिया में समस्या और शिथिलता है। इसके साथ यह छवि तो बनी ही है कि भारत सरकार दूसरी लहर का प्रभावी प्रबंधन कर पाने में नाकाम रही है। इन बातों ने भारत में कारोबार करने या भारतीय कंपनियों के साथ कारोबार को लेकर जोखिम की धारणा बढ़ा दी है। कोविड महामारी की दूसरी लहर के कुप्रबंधन की संभावित राष्ट्रीय कीमत भारतीय उद्योग जगत को चुकानी होगी। मौजूदा हालात में यह अत्यंत खेदजनक है और इससे पार पाने के लिए निरंतर प्रयास करना होगा कि देश की प्रतिष्ठा को पहुंची क्षति की भरपाई की जा सके।

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