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नोट छपाई

Updated: Jun 10, 2021

सरकार को अब जो दे रहे नोट छापने की सलाह, तब वहीं मोदी के आर्थिक ज्ञान पर उठाएंगे सवाल

(ब्रजबिहारी)

(साभार दैनिक जागरण )


देश का विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ता है। खासकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तो नरेंद्र मोदी को निशाने पर रखना उनके अस्तित्व के लिए जरूरी होता जा रहा है। मीडिया में चर्चा में बने रहने के लिए उनके पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। उन्हीं की राह पर उनकी पार्टी के दूसरे नेता भी हैं। इनमें पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी शामिल हैं। केंद्र सरकार की आलोचना में मशगूल रहने वाले कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता ने एक नई सलाह दी है। उनका कहना है कि महामारी से उपजे आíथक हालात का मुकाबला करने के लिए सरकार को नोट छापने के विकल्प पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।


दरअसल, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री डा. अभिजीत बनर्जी ने पिछले दिनों मोदी सरकार को नोट छापने की सलाह दी थी। उनके अलावा कई और अर्थशास्त्री भी यह सुझाव दे चुके हैं। कोटक महिंद्रा बैंक के प्रबंध निदेशक और उद्योग संगठन सीआइआइ के अध्यक्ष उदय कोटक भी इसी तरह की सिफारिश कर चुके हैं। पिछले हफ्ते जब एक प्रेस कांफ्रेंस में चिदंबरम से बनर्जी के इस सुझाव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने भी इसका समर्थन किया। जाहिर है, मोदी के घोर आलोचक अर्थशास्त्री डा. अभिजीत बनर्जी जिस रास्ते पर चलने की सलाह दे रहे हैं, उसका समर्थन तो चिदंबरम आंख मूंदकर करेंगे, लेकिन केंद्र सरकार को ऐसे अव्यावहारिक सिफारिशों पर कतई ध्यान नहीं देना चाहिए। बनर्जी और चिदंबरम के अनुसार सरकार को अपने राजकोषीय घाटे की चिंता किए बिना करेंसी नोट छापकर सरकारी खर्च को बढ़ाना चाहिए। कोविड के प्रभावित गरीबों के हाथों में ज्यादा से ज्यादा नकदी पहुंचानी चाहिए, ताकि वे उन पैसों से अपनी जरूरत की चीजें खरीदें और बाजार में मांग बढ़े और अर्थव्यवस्था की गाड़ी रफ्तार पकड़ सके। सुनने में तो यह अच्छा लगता है, लेकिन यह रास्ता जोखिम भरा है।


प्रसंगवश बता दें कि वर्ष 1929-32 की महान मंदी के समय ब्रिटिश अर्थशास्त्री जान मेनार्ड कीन्स ने सबसे पहले नोट छापकर सरकारी खर्च बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। उस दौरान कीन्स के इस सिद्धांत को काफी अहमियत मिली। अनियंत्रित पूंजीवाद के कारण पैदा हुई मंदी की समस्या को दूर करने में उनका यह उपाय काफी हद तक सफल रहा था, लेकिन कालांतर में उनका यह सिद्धांत अर्थशास्त्रियों के बीच अलोकप्रिय होता चला गया। इसके पीछे ठोस वजहें भी हैं। पहली नजर में तो यह सुझाव बहुत व्यावहारिक लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो इससे लाभ से ज्यादा नुकसान है। सबसे पहली बात तो यह है कि नोट छापकर सरकारी खर्च बढ़ाने से अर्थव्यवस्था में उत्पादन तो बढ़ता नहीं है, क्योंकि इसमें वक्त लगता है, लेकिन नकदी हाथ में आते ही मांग तत्काल बढ़ जाती है। ज्यादा मांग और कम आपूíत के कारण महंगाई बढ़ने लगती है तो अंततोगत्वा अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित होती है। महंगाई बढ़ने से सरकारी बांड की कीमत गिरने लगती है और निवेशक उससे दूर होने लगते हैं। उन्हें आकर्षति करने के लिए सरकार को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ती है जो फिर महंगाई की आग में घी का काम करता है और इस तरह एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होता है।


जहां तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का सवाल है, तो मोदी सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही रास्ते पर चल रही है। लोगों के पास नकदी की कमी नहीं है। अभी रबी के सीजन में सिर्फ गेहूं की सरकारी खरीद के जरिए 76 हजार करोड़ रुपये सीधे किसानों के खाते में गए हैं। पिछले एक साल की बात की जाए तो केंद्र सरकार की विभिन्न स्कीमों के जरिए जनता के खातों में 4.3 लाख करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए हैं। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए यह लेन-देन होने के कारण 1.8 करोड़ रुपये की बचत भी हुई है, जो दलालों और बिचौलियों की जेब में चला जाता था। अकेले पीएम गरीब कल्याण योजना के तहत दिसंबर, 2020 तक 42 करोड़ गरीब लोगों के खातों में 68,903 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए।

लिहाजा, केंद्र सरकार को डा. अभिजीत बनर्जी और पी चिदंबरम जैसे विरोधियों की सलाह पर ध्यान देने के बजाय अपने चुने हुए रास्ते पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। ये वही विपक्ष है जिसने केंद्र को टीकाकरण के विकेंद्रीकरण की सलाह दी और जब ऐसा कर दिया गया तो हायतौबा मचा रहे हैं कि मोदी सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। जाहिर है, आज जो लोग केंद्र सरकार को अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए नोट छापने की सलाह दे रहे हैं, कल जब इसके बुरे नतीजे सामने आएंगे तो केंद्र पर हमला करने में भी सबसे आगे रहेंगे और फिर चिदंबरम जैसों को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक ज्ञान को माचिस की डिबिया पर लिखा जा सकता है।


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