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परमशक्ति की उप शक्तियों का सम्मान करो -डॉ आनंद प्रदीक्षित

जो शक्ति दी है ईश्वर ने उसका सदुपयोग करो

©डॉ आनंद प्रदीक्षित

ज्ञानेंद्रियों का महत्व समझो ।कल्पना करो ,सिर्फ कल्पना ही कर लो कि तुम सुबह उठते हो और तुम्हारी आंखें काम करना बंद कर देती मानलो ईश्वर 1 दिन के लिए तुम्हारा देखना निलंबित कर देता है ।यह तुम्हें पता नहीं है कि यह सिर्फ 1 दिन के लिए है तो तुम ईश्वर से रो रो के आंखें मांगोगे दृष्टि मांगोगे और तमाम चिकित्सकों के पीछे दौड़ पड़ोगे सिर्फ दृष्टि पाने के लिए। इसी प्रकार जब स्वाद और सूंघने की शक्ति चली जाती है तो तो तुम कितने बेचैन हो जाते हो कि कोरोना का प्रकोप हो गया है और इसके लिए अस्पतालों और चिकित्सकों के चक्कर लगाने लगते हो और भगवान से प्रार्थना करते हो कि जल्दी ठीक कर दे ।इसी प्रकार यदि बोलने की शक्ति चली जाए या स्पर्श महसूस करने की शक्ति चली जाए ,,सुनने की शक्ति चली जाए तो तुम चिकित्सकों से लेकर भगवान और झाड़-फूंक करने वाले तमाम तांत्रिकों तक चक्कर लगा डालोगे ।

हम सिर्फ पांचों ज्ञानेंद्रियों के लिए जीते हैं और इनके बिना रह नहीं सकते ।अब जरा यह सोचो कि जब तुम्हारी खोई हुई ज्ञानेंद्रियों की संवेदन शक्ति जो तुम्हें बचपन से मिली हुई है तुम्हें वापस मिल जाए तो तुम संसार के सबसे अधिक प्रसन्न प्राणी हो जाओगे। क्या ज्ञानेंद्रियां इतनी आवश्यक है ?यह बात तुम अच्छे से जानते हो कि ज्ञानेंद्रियां बहुत आवश्यक है तो फिर बेटा इनका दुरुपयोग क्यों करते हो? स्वाद इंद्रिय का दुरुपयोग करके अखाद्य खाते हो ,गलत बातें बोलते हो ,गलत चीजें सुनते हो, सुनकर प्रसारित करते हो ,अफवाहें फैलाते हो ,,आंखों का दुरुपयोग करते हो, गंदी दृष्टि डालते हो। जब ईश्वर ने ज्ञानेंद्रियां दी है तो इनकी कदर करो और उनकी भी कदर करो जिन्हें ईश्वर ने कोई ना कोई संवेदन शक्ति छीन ली है ।सोचो वह कैसे रहते होंगे ?जैसे कि नेत्रहीन मूकबधिर आदि ।उन्हें अपमानित ना करो और इसीलिए अपनी संवेदन शक्तियों का सम्मान करो और उन्हें देवी देवता के समान पूजा करो। असली देवी देवता ज्ञानेंद्रियां ही हैं ।बहुत सतर्कता से उनका उपयोग करो। भगवान ने जो ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां दी हैं उनका सतर्कता पूर्वक और संभाल के प्रयोग करो ।कोई गलती ना हो जाए कोई चूक ना हो जाए। अन्यथा यह ईश्वर के दिए हुए वरदान का दुरुपयोग होगा ।तुम बुरा देखने से अपने को रोक नहीं सकते, बुरा सुनने से रोक नहीं सकते, किंतु बुरा बोलने से रोक सकते हो ।बुरी तरह देखने से अपने को रोक सकते हो ।गलत प्रकार से स्पर्श करने से अपने को रोक सकते हो ।गलत खाद्य पदार्थों के स्वाद से अपने को रोक सकते हो ।दुर्गंध से अपने को रोक सकते हो । ज्ञानेंद्रियों का सदुपयोग करो। इन्हें ईश्वर की सेवा में लगाओ ।समाज की सेवा में लगाओ ।अच्छी छवि बनाओ ।

जीवन आनंदमय रहेगा आनंद प्रदीक्षित की यही सलाह है


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