top of page

पुस्तकें

हर पल पुकारती हैं पुस्तकें हमें अपने साथ ले लो

(अनिता भटनागर जैन, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी )

(साभार हिंदुस्तान )


मेरे कदम ठिठक गए। मॉल के द्वार के समीप अस्थाई दुकानों में से एक पर मेरी नजर अटक गई। किताबों के ढेर पर लहराता बोर्ड, बच्चों की पुस्तकें 250 रुपये प्रति किलो। जिस देश में ज्ञान को देवी सरस्वती के रूप में पूजा जाता है, वहां अब यह स्थिति हो गई? दूसरी ओर, आज के दौर में भी यह बात दुखद लगी कि साक्षात्कार में हिंदी साहित्य का अभ्यर्थी एक भी उपन्यास का नाम नहीं बता पाया, जो उसने पढ़ा हो। मुझे आज भी याद है, विद्यालय में लाइब्रेरी पीरियड का हमें बेसब्री से इंतजार रहता था। चिंता रहती थी कि अपेक्षित पुस्तक की वेटिंग लिस्ट मेरे नाम तक पहुंचेगी या नहीं और यदि पुस्तक मिल जाती, तो उल्लासोन्माद की सीमा न होती। क्यों खत्म हो रहे हैं पुस्तकालय? क्यों घट रही है पुस्तक पढ़ने की प्रवृत्ति? यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 1995 से यूनेस्को द्वारा विश्व बुक रीडिंग दिवस प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन शेक्सपियर और अन्य प्रख्यात लेखकों की पुण्यतिथि भी होती है। जाहिर है, इसका उद्देश्य पुस्तक पढ़ने की घटती हुई आदत पर अंकुश लगाने का है। यह कहा गया है कि जिस प्रकार शरीर के लिए व्यायाम आवश्यक है, उसी प्रकार मस्तिष्क के लिए पढ़ना। जो आप पढ़ते हैं, सोचते हैं और बार-बार करते हैं, उसी से आपके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। पुस्तक विचारों के लिए भोजन समान हैं। हजारों वर्ष पूर्व के लेखकों, चिंतकों के विचार और कहानियां उनकी पुस्तकों के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं। पुस्तक पढ़ना आवश्यक कौशल विकास से जुड़ी गतिविधि है। व्यक्ति के मस्तिष्क और व्यक्तित्व, दोनों का विकास होता है। मानवीय समस्याओं की समझ, सोच, आचरण पर भी प्रभाव पड़ता है।

सभी अच्छी आदतों की तरह पुस्तकें पढ़ने का बीज भी बाल्य-काल में ही बोया जाता है। पहले नानी-दादी या माता-पिता द्वारा कहानी सुनाने की परंपरा थी। सामाजिक, आर्थिक व जन-सांख्यिकीय परिवर्तनों के फलस्वरूप यह अब समाप्त हो गई है। तकनीकी गैजेट से बच्चों को लुभाया जा सकता है, लेकिन पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता। सुप्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड ने मुझे बताया था कि आजकल बच्चे कोई पुस्तक पढ़े बिना लेखक बनना चाहते हैं। क्वाट्र्ज में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि वर्ष में जितना समय लोग सोशल मीडिया में लगाते हैं, उतने में 200 पुस्तकें पढ़ी जा सकती हैं। कोरोना-काल में बच्चों के लिए नई पुस्तकों की उपलब्धता और घटते पाठक का दुश्चक्र और जटिल हो गया है। वैश्विक स्तर पर पुस्तक प्रकाशन की दर भी नकारात्मक (-7.5 प्रतिशत) हो गई है।

परिवार और विद्यालय अच्छी आदतें विकसित करने में एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि माता-पिता प्रतिदिन एक पृष्ठ की कहानी भी बच्चों को पढ़कर सुनाएं, तो उनसे रिश्ते सुदृढ़ होंगे और पुस्तकों से बचपन की सकारात्मक यादें जुड़ेंगी। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बच्चे कहानी की दुनिया में पदार्पण करेंगे। आदतों में बच्चे बड़ों का ही अनुकरण करते हैं। यदि परिवार के बड़े पुस्तकें पढ़ेंगे, उन पर चर्चा करेंगे, तो स्वत: ही बच्चे के मन में पुस्तक पढ़ने की इच्छा होगी। जन्मदिन, त्योहार या किसी विशिष्ट उपलब्धि पर अब कपड़े, खिलौने, सजावट के सामान, बाहर खाना खिलाने आदि से पुरस्कृत किया जाता है। आपने आखिरी बार कब अपने बच्चों या मित्रों को पुस्तक (कोर्स के अलावा) भेंट की थी? विद्यालय की गतिविधियों में भी पुस्तक पढ़ने संबंधी कार्य को अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना चाहिए। पढ़ने को प्रसन्नता और मनोरंजन से जोड़ना जरूरी है। पुस्तकों में असीमित विविधता उपलब्ध है। जैसे, आत्मकथा, प्रेरणात्मक कहानी, थ्रिलर, काल्पनिक लेखन आदि। सरकार के स्तर पर भी पुस्तक पढ़ने की आदत के विकास के लिए कोशिशें होनी चाहिए। हाथ में कड़क कागज की पुस्तक हो या पुरानी, अनेक बार पढ़ी पीले पृष्ठों की पुस्तक, जूलिया डोनाल्डसन की ये पंक्तियां सब पर लागू होती हैं- पुस्तक खोलकर मैं अंदर चली गई।/ अब मुझे कोई ढूंढ़ नहीं सकता।/ मैंने वास्तविक दुनिया पीछे छोड़ दी/ मैंने पुस्तक में कुछ मित्र बनाए,/ उनकी हंसी और आंसू साझा किए,/ पुस्तक समाप्त कर मैं बाहर आई,/ मेरी कुरसी, मेरा घर यथावत था,/ परंतु अब मेरे भीतर एक पुस्तक है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)


100 views1 comment

Recent Posts

See All
bottom of page