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बच्चों को स्पर्श में न कहना सिखाइये

शिवानी कोहोक का बीबीसी पर लेख ,आभार सहित


अंजु मानती हैं कि बच्चों के साथ इस विषय पर बातचीत करने से उनमें अपने शरीर को लेकर सजगता आती है. साथ ही वो दूसरों की निजता का सम्मान करना भी सीखते हैं.

अंजु किश कहती हैं, "अगर आप चाहते हैं कि कोई आपको गले ना लगाए तो ये कहने में कोई बुराई नहीं है. आप उनसे कह सकते हैं कि आप हाथ मिलाना या हाई-फाइव करना पसंद करते हैं."

ऑस्ट्रेलिया की जयनीन सैंडर्स एक लेखिका हैं जो पांच से 16 साल तक के बच्चों के लिए किताबें लिखती हैं. वो एक प्राथमिक स्कूल में शिक्षिका भी हैं.

वह बच्चों को शरीर की सीमाओं का सम्मान करना सीखाती हैं.

जयनीन कहती हैं, "हमें बुनियादी चीज़ों के साथ शुरू करने की ज़रूरत है. जैसे छोटे बच्चों में शरीर से जुड़े अधिकारों को लेकर आत्मविश्वास जगाना और उन्हें सशक्त करना."

"ताकि जब वे किशोर हो जाएं तो उन्हें अपने शरीर से जुड़े अधिकारों की जानकारी हो. उन्हें पता हो कि ये उनका शरीर है और इस पर उनका ही अधिकार है."


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जयनीन सैंडर्स कहती हैं कि बच्चे अगर असहज हैं तो उन्हें गले लगाने से मना करना आना चाहिए.

ये केवल यौन संबंधों के बारे में नहीं

जयनीन के लिए सहमति का मतलब एक वयस्क के तौर पर सिर्फ़ यौन संपर्क से नहीं है बल्कि ये सुरक्षा और निजता के बारे में बताना है.

वह कहती हैं, "ये इस बारे में सीखाना है कि अगर वो गले लगाना और किस करना नहीं चाहते हैं तो मना कर सकते हैं, चाहे वो दादा-दादी से ही क्यों ना हो. बच्चे चाहे हाँ कहें या ना, हमें उसका सम्मान करना चाहिए."

"आप ख़ुद से ये नहीं मान सकते कि आप उन्हें गले लगा सकते हैं या उनका हाथ पकड़ सकते हैं. आपको उनके शारीरिक हाव-भाव समझने चाहिए और उनसे पूछना चाहिए. इसे ही सहमति लेना कहते हैं."

अंजु कहती हैं कि रिश्तेदारों के बीच में शारीरिक संपर्क बहुत सामान्य बात है और गले लगाना प्यार दिखाने का एक स्वाभाविक तरीक़ा है. वांछित और अवांछित स्पर्श के बीच का अंतर ये पता करने में है कि किसी को स्पर्श करना सही है या नहीं. ये शिष्टाचार सभी के साथ दिखाना चाहिए.

वह कहती हैं, "जैसे आपका अपने शरीर पर अधिकार है वैसा ही दूसरों का भी अपने शरीर पर अधिकार है. आपको उन्हें छूने से पहले उनसे पूछना चाहिए. जैसे क्या आपको गले लगा सकते हैं? क्या आपकी गोदी में बैठना ठीक है? बच्चे ये पूछ सकते हैं."

सेनेगल में सेक्स एजुकेटर सिंथिया लोलो कहती हैं कि अलग-अलग सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि के माता-पिताओं में संभव है कि इस बात पर सहमति ना हो कि इस विषय पर कैसे बात की जाए. लेकिन, 'ना कहना ठीक है', बच्चों को ये सीखाना उन्हें सशक्त बना सकता है, ख़ासतौर पर कुछ ख़ास पृष्ठभूमि वाले बच्चों को.

सिंथिया कहती हैं, "ये किसी को ग़ैर-ज़रूरी लग सकता है लेकिन इसका प्रभाव लंबे समय तक होता है, ख़ासतौर पर अफ़्रीकी समाज में जहाँ बच्चों को बड़ों के सामने मुखर या असहमत होने के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाता. इसे उनका असम्मान माना जाता है."

सहमति एक कौशल है

तीनों विशेषज्ञों के मुताबिक़ बच्चों को सहमति के बारे में सिर्फ़ बता देना ही काफ़ी नहीं है. वो ये समझने में सक्षम हों कि सहमति क्या है, ये कब और कैसे ज़रूरी होती है.

अंजू किश कहती हैं कि इसके लिए माता-पिता असल ज़िंदगी की स्थितियों के उदाहरण दे सकते हैं. वो बता सकते हैं कि सहमति लेते या देते समय किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

वह बताती हैं, "सहमति एक कौशल है, ये सिर्फ़ एक सिद्धांत नहीं है. अपने बच्चों को मुश्किल स्थितियों से, दोस्तों के दबाव से निपटना और सही फ़ैसले लेना सिखाएं. अलग-अलग हालात उनके सामने रखकर, उनकी प्रतिक्रिया पर उनसे चर्चा करें."

सिंथिया अपने सेशन में उन सामान्य मिथकों को तोड़ने की कोशिश करती हैं जिनमें ये बताया गया कि एक लड़का होने का क्या मतलब है और लड़कियों के क्या करना चाहिए, क्या नहीं.

वो सलाह देती हैं कि समय-समय पर अपने बच्चे से बात करें कि क्या कभी उनके साथ ऐसा अनुभव हुआ है और तब उन्होंने क्या किया था.

सिंथिया कहती हैं, "अफ़्रीका में लड़कों को हावी होने और लड़कियों को लुभाने की सीख दी जाती है. वहीं, लड़कियों को हमेशा साथ में रहकर और अच्छी तरह खेलना सिखाया जाता है."

"हम कुछ ऐसे सवाल पूछते हैं जैसे- अगर कोई लड़का तुम्हें खाना खिलाता है और फूल ख़रीद कर देता है और फिर वो तुमसे शारीरिक संबंध बनाना चाहता है लेकिन तुम इसमें सहज नहीं हो, ऐसे में तुम क्या करोगी? ऐसे सवालों से वो ये सोच पाती हैं कि वो क्या चाहती हैं और ऐसी स्थितियों में उन्हें कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए."

एक और महत्वपूर्ण बात ये सिखाना है कि सहमति बाद में भी दी या ली जा सकती है.

जयनीन कहती हैं, "बच्चों को ये समझना ज़रूरी है कि वो सहमति को लेकर अपना फ़ैसला बदल सकते हैं. आप यौन संपर्क के दौरान कभी भी ना कह सकते हैं."

"इसका मतलब ये है कि सामने वाले शख़्स को तुरंत रुक जाना चाहिए. कोई लड़की या लड़का अगर किसी बात के लिए 'ना' कहते हैं तो उसका मतलब 'ना' ही होता है. इसका मतलब 'शायद' या 'पक्का नहीं है' बिल्कुल नहीं होता."

सुरक्षित माहौल बनाना

माता-पिता और अभिभावकों को इस पेचीदा विषय पर कैसे काम करना चाहिए? तीनों विशेषज्ञ ये मानते हैं कि स्कूल और घर पर बच्चों के साथ खुली चर्चा करना सबसे अच्छा तरीक़ा है.

जयनीन मानती हैं कि यौन शिक्षा को ऐसा विषय नहीं समझना चाहिए जो एक ही चैप्टर में या वर्कशॉप में पूरा हो जाता है. इसके बजाय वो कहती हैं कि 13 और 18 साल की उम्र के बच्चों को नियमित शिक्षक के तौर पर लगातार सहयोग देना चाहिए.

अंजु किश सलाह देती हैं कि घर पर माता-पिता को बच्चों से बात करने का सही समय तलाशना चाहिए. मैगेज़ीन पढ़ते वक़्त या टीवी देखते वक़्त बात शुरू करनी चाहिए.

वह कहती हैं कि इससे बच्चे को सवाल पूछने का, इस विषय पर सोचने का और अलग-अलग स्थितियों व नज़रिये से देखने का मौका मिलेगा जिससे उसकी एक सोच विकसित हो पाएगी.

अंजु कहती हैं, "जानकारी देने के हर पल का फायदा उठाएं क्योंकि सामान्य तौर पर कही गईं बातें कई बार दिमाग में अटक जाती हैं."

जयनीन बताती हैं कि कोई आपत्तिजनक व्यवहार होने पर ऐसे व्यस्क व्यक्ति का होना ज़रूरी है जिससे एक किशोर खुलकर बात कर सके.

अंजु का कहना है, "बच्चे जब एक सुरक्षित वातावरण में इन विषयों पर चर्चा करते हैं तो वो ज़्यादा बेहतर सीखते हैं."

"माता-पिता होने के नाते आप वो व्यक्ति होने चाहिए जिनसे बच्चा अपनी बात कह सके, सलाह और सहयोग ले सके. ऐसा माहौल बनाने के लिए आपको दोष मढ़ने और राय बना लेने जैसे व्यवहार से दूर रहना होगा."

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