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मस्तिष्क विज्ञान-डॉ स्कंद शुक्ल

(साभार)प्राकृतिक जंगल में यों ही शेर दिख जाने , अभयारण्य में शेर को सायास देख पाने और चिड़ियाघर में शेर को देखने का मनोविज्ञान-स्पेक्ट्रम अद्भुत है। पहली स्थिति में जो भय उपजता है , वह दूसरी से तीसरी स्थिति में जाते-जाते कौतूहल में बदल जाता है।


( स्थिति के नियन्त्रण में होने पर बहुधा ) भय के प्रति हम सपाट जिज्ञासु नहीं होते , कौतूहलपूर्ण रहा करते हैं। सपाट जिज्ञासा जिन प्रश्नों के लिए समाधान खोजती है , वे किन्हीं परिस्थितियों में हमें डराते नहीं जान पड़ते। यहाँ पृथ्वी पर बैठे-बैठे सूर्य के प्रकाश के प्रति जिज्ञासा हो सकती है , दही में मौजूद जीवाणुओं के प्रति भी यह जन्म ले सकती है। पर जहाँ आदिम विशालता-तीव्रता-हिंसात्मकता से हमारा सामना होता है , तब हम या तो डरते हैं अथवा कौतूहल प्रकट करते हैं।


हमारे मस्तिष्क में दो बादामनुमा संरचनाएँ हैं , जिन्हें एमिग्डेला कहा जाता है। समस्त भावनाओं की अनुभूति हमें इन्हीं से होती है। भय सभी प्राचीनतम भावनाओं में से एक है। जब जंगल में अनायास शेर दिखता है ,यह इसी एमिग्डेला में तन्त्रिका-गतिविधि के कारण हमें भय मालूम देता है। किन्तु जब यही शेर हमें गाइड अभयारण्य में दिखाता है , तब इस भयानुभूति में पर्याप्त न्यूनता आ चुकी होती है। लोग गाड़ी में सवार होकर उस हिंस्र जीव को न्यून भय और पर्याप्त कौतूहल के साथ देखते हैं। फिर जब यही शेर ज़ू में दिखायी देता है , तब भय एकदम समाप्त हो चुका होता है। उसके स्थान पर पूरी तरह कौतूहल काबिज़ रहा करता है : हिंसा के प्रति जिज्ञासा के साथ लोग उस जंगली जानवर पर नज़रें टिकाये रहते हैं।


मस्तिष्क के दूसरे हिस्से हिप्पकैम्पस व फ्रण्टल कॉर्टेक्स भय उपजाने वाली एमिग्डेला पर 'ब्रेक' लगाते हैं , उसे नियन्त्रित करते हैं। "अरे यह शेर तो है , जिससे तुम डरते हो पर यह अभयारण्य अथवा चिड़ियाघर का शेर है !" इस तरह से सोचना महसूसने पर भारी पड़ जाता है। तर्कपूर्ण सोच से हम आदिम अनुभूति को दबा देते हैं और भय की जगह पर कौतूहल आ जाता है।


डर के प्रति हमने शिक्षा पायी है ;सभी जीव-जन्तु पाते हैं। क्या ख़तरनाक है और क्या नहीं , इसके बारे में सभी को प्रशिक्षित होना ज़रूरी जो है। पर अन्य जीव-जन्तुओं की तुलना में मानव-प्रजाति की शिक्षाएँ दोहरी हैं। जानवर स्वयं भयकारी स्थिति में फँसकर या अपनी प्रजाति के किसी जीव को भयकारी स्थिति में देख कर भय से भयभीत होना सीखते हैं। जबकि मनुष्य इन तरीक़ों के अलावा पढ़कर और जटिल भाषा में वर्णन सुनकर भी सीखते हैं। इस तरह से इंसानी डर का ज्ञान प्रत्यक्ष के साथ परोक्ष भी हुआ करता है। इसी तरह से सुरक्षा भी हम प्रत्यक्ष-परोक्ष दोनों ढंग से सीखते हैं , जबकि पशु प्रत्यक्ष ढंग से ही ऐसा कर पाते हैं।


मनुष्य के विकास ने उसके भीतर ढेरों आदिम भयों को कौतूहल में बदल डाला है। हम आसपास की परिस्थितियों को इतना नियन्त्रित रख पाने में सफल हुए हैं , जितने अन्य जीव नहीं हो पाये। नतीजन उनके भीतर अभी भी पर्याप्त भयभीति बनी हुई है , जबकि हमारी भयभीति क्षीण से क्षीणतर होती जा रही है। इसी भयभीति-क्षीणता के साथ एक निश्चिन्तता आती है : एक ऐसी स्थिति जिसमें हम अचिन्त भाव के साथ ढीले-ढाले पड़ जाते हैं। हमारे रिफ्लेक्स कुन्द पड़ जाते हैं और हम फिर अचानक भयकारी परिस्थिति में बड़ी चूक कर जाते हैं।


जब डरने और डर को बरतने का अभ्यास ही नहीं रहेगा , तब डर से बेहतरीन मुठभेड़ कैसे होगी ?


--- स्कन्द।


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