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मैं पुस्तकें क्यों नहीं लिखता -डॉ आनंद प्रदीक्षित

मुझसे बहुत से मेरे शिष्य कहते हैं कि सर अप्प पुस्तकें लिखें, उनकी बात सही है पुस्तकें लिखने से पहचान बहुत अधिक बढ़ती है लेकिन उस बढ़ी हुई पहचान का सुख में उठा चुका हूं। 1978 से लेकर 1984 तक मैंने करीब 100 पुस्तकें लिखी इसके बाद 1990 में उत्कर्ष एकेडमी के लिए बहुत सारे स्टडी मैटेरियल लिखा जो कि पुस्तकें ही थी और उस समय बाजार में बिकी भी और ठीक-ठाक बिकीं।अर्थात खुश होने के लिए पर्याप्त संख्या में बिकीं यानी एक एक पुस्तक करीब 5000 6000 कॉपी बिकी फिर चुटकुलों की एक किताब लिखी और 20 कविताएं लिखी जो एक पुस्तक के आकार में प्रकाशित हुई ।बस फिर सरकारी नौकरी और तमाम व्यस्तताओं में खो गया। अखबारों मैगज़ीनों में लिखना भी बंद रहा और पुस्तकें लिखने का तो कोई समय ही नहीं बचा।

😊 मैं पुस्तक क्यों नहीं लिखता यह बताने के पहले एक छोटी सी कहानी बता रहा हूं शायद सबको उत्तर मिल जाए ।

😊मैं एक बार अपने एक रिलेटिव के घर गया वह आगरा में रहते हैं और बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं। निश्चय ही बहुत धनवान भी है। बात बहुत पहले की है जब उनसे नया-नया संबंध जुड़ा था ।उनके बेटे की सगाई थी और उस सगाई में हजारों लोग आये थे।पूरी रैली हो रही थी कितनी गाड़ियां ट्रैक्टर और हर तरह के वाहन वहां थे कि बिल्कुल यही लग रहा था कि कोई रैली हो रही है। इस सब के बावजूद भी वह बहुत विनम्र और उनका पूरा परिवार बहुत ही स्नेहपूर्ण पूर्ण है । मैंने उनसे थोड़ी फुर्सत मिलते ही कहा कि आपको तो चुनाव में खड़े होना चाहिए ,ठीक उसी तरह जैसे मेरे बच्चे मुझसे कहते हैं कि आपको तो पुस्तके लिखनी चाहिए 😊उन्होंने मेरी ओर देखा और मुस्कुरा दिया और कोई उत्तर नहीं दिया मुझे बहुत बाद में समझ में आया कि वह चुनाव में क्यों नहीं खड़े होते क्योंकि जितने लोग चुनाव में खड़े होते हैं उन सब से उनकी हैसियत बहुत ऊपर की थी और चुनाव में खड़े होने वाले उनसे आशीर्वाद प्राप्त करके खड़े होते थे ,अर्थात वह चुनाव में खड़े होकर अपनी उस बहुत ऊंची प्रतिष्ठा से नीचे नहीं उतरना चाहते थे । चुनाव में खड़े होना उनके लिए बहुत ग्राउंड लेवल की चीज हो चुकी थी ।मुझे अचानक उनकी याद आई और अपनी भी।

उत्तर यही है अब लोग किताबें लिख रहे हैं और यूट्यूब पर मेरे द्वारा व्यक्त विचारों को उन किताबों में प्रयोग कर रहे हैं ।यह बात अलग है कि वह मेरा नाम भले ना ले यह उनकी अपनी सोच है लेकिन मेरे वीडियोस तो बहुत लोगों के लिए रॉ मैटेरियल बन चुके हैं।

ईश्वर की कृपा है कि इस स्तर तक मैं पहुंच गया हूं ।

मेरे वीडियो यूट्यूब पर सदैव रहने वाले हैं ।पुस्तकें सबको नहीं दिखती हैं लेकिन वीडियो सब को देखेंगे, मैं रहूं या ना रहूं ।

पुस्तकें तो खरीदनी पड़ती है जबकि यह वीडियो साइबर अंतरिक्ष में निशुल्क तैर रहे हैं ।

मुझे अपने बच्चों से इन वीडियो के मार्फत बात करना अधिक मुफीद और बेहतर लगता है। अपने जीवन की सार्थकता इसी बात में लगती है ।अब इस उम्र में फिर से ब्रांड बनने से कोई लाभ नहीं है पुस्तक लिखकर कुछ पैसे कमा सकते हैं तो इस उम्र में कोई अधिक पैसे कमाने से भी लाभ भी नहीं है।

इतना मिलता रहे कि काम चलता रहे इसीलिए मैं पुस्तकें लिखने की बात सोचता नहीं हूं ।कभी-कभी कुछ छोटे-छोटे बैच लांच करता रहता हूं जिससे कि मेरा काम चलता रहे और मैं निशुल्क यूट्यूब पर उपस्थिति दर्ज कराता रहूं ।

बस एक योजना और है कि किशोर बच्चों के लिए आनंद लाइफ फ्री चैनल पर एक प्लेलिस्ट बनाऊं और कोशिश करूं कि उन्हें वह संस्कार दे सकूँ जो उन्हें परिवारों से नहीं मिल पाते ।यही बातें पुस्तकों में लिखूंगा तो कितने लोग पढ़ेंगे? हो सकता है वीडियो के व्यूज से ज्यादा लोग पुस्तक खरीद ले ,इसकी पूर्ण संभावना है ,किंतु मेरा संतोष अब पुस्तकें लिखने में नहीं है क्योंकि अब मेरे शिष्य बड़े लेखक बन रहे हैं,आईएएस पीसीएस बन रहे हैं।

जब शिष्य उस स्तर पर पहुंच जाते हैं तो उनके साथ उस फील्ड में उतरने का कोई अर्थ नहीं है। मुझे बहुत संतोष होता है जब लाल जी जायसवाल को विभिन्न समाचार पत्रों में छपते हुए देखता हूं अब ऐसे में मैं भी अगर लिखने लगूं समाचार पत्रों में तो गुरु शिष्य में अंतर क्या रह जाएगा। पीढ़ियों का अंतर रहना चाहिए ।इसीलिए मैं पुस्तके नहीं लिखता इसीलिए अब मैं लेख नहीं लिखता।

😊 मेरे विचार से उत्तर मिल गया होगा

अब मेरे विचार मेरे शिष्यों की कलम से निकलेंगे।


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