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विज्ञान लेख

पेप्टिक अल्सर यानी अमाशय और छोटी आंत के शुरुआती हिस्से (duodenum) में होने वाले अल्सर बहुत व्याधि देते हैं। हमारे अमाशय में एक बहुत तीव्रता का अम्ल HCL होता है जो भोजन के पाचन में मदद करता है। इसकी तीव्रता से बचाने के लिए अमाशय की दीवारों पर म्यूकस की परत होती है जो इस एसिड को दीवारों से लगने नहीं देती। अगर यह परत थोड़ी सी भी हट जाए तो यह एसिड अमाशय की दीवारों पर पहुंच जाता है और उसे खराब कर देता है। इस तरह बने जख्म पेप्टिक अल्सर कहलाते हैं।

किसी समय कहा जाता था कि once an ulcer always an ulcer, यानी एक बार अल्सर हो जाये तो ये हमेशा रहेंगे। लक्षणों में पेट में जलन, नाभि से ऊपर के पेट के हिस्से में भयंकर दर्द हो सकते हैं। अन्य लक्षणों में पेट का फूलना, उल्टियां, भूख का बन्द होना, शौच के साथ खून आना या गहरे रंग का शौच आना, बहुत अधिक डकारें आना हो सकते हैं। एक और इसका गम्भीर लक्षण हो सकता है अंदरूनी रक्तस्राव। रक्तस्राव इतना अधिक भी हो सकता है कि मरीज में खून की कमी हो जाये और उसे खून चढ़ाना पड़ जाए। डॉक्टर लक्षणों, केस हिस्ट्री और जांचों के आधार पर बीमारी का पता लगाते हैं।

इसका एक महत्वपूर्ण कारण है H pylori नामक एक बैक्टीरिया। दूसरे कारण हो सकते हैं कुछ खास दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक सेवन, धूम्रपान और शराब का सेवन। इनमें से एक सबसे महत्वपूर्ण कारण H PYLORI बैक्टीरिया को माना जाता है। इस बैक्टीरिया की खोज की कहानी काफी रोचक है। ऑस्ट्रेलिया में एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं जिनका नाम है बैरी जेम्स मार्शल। ये यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में क्लीनिकल माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर हैं। माइक्रोबायोलॉजी विज्ञान की वह शाखा है जो सूक्ष्मजीवों का अध्ययन करती है। 1951 में जन्मे डॉ बैरी जेम्स मार्शल ने यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के स्कूल ऑफ मेडिसिन से 1974 में एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। 1977 में इनको रॉयल पर्थ हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में रजिस्ट्रार के तौर पर नियुक्ति मिली। 1981 में ये रोबिन वारेन नामक एक पैथोलोजिस्ट से मिले जो इसी अस्पताल में फेलोशिप कर रहे थे। दोनों ने गैस्ट्राइटिस यानी अमाशय की सूजन का अध्ययन करते हुए पाया कि इस व्याधि के साथ एक बैक्टीरिया की मौजूदगी है। 1982 में इन्होंने दावा किया कि पेप्टिक अल्सर इसी बैक्टीरिया की वजह से होता है। लेकिन उस समय के दूसरे वैज्ञानिकों ने इनकी बात मजाक में उड़ा दी। उनका मानना था कि इतने ज्यादा अम्लीय वातावरण में कोई बैक्टीरिया जिंदा रह ही नहीं सकता। 1983 में इन्होंने अपना शोधपत्र छपने के लिए भेजा तो उसे रिजेक्ट कर दिया गया।

लेकिन डॉ बैरी मार्शल विज्ञान के आदमी थे। एक सच्चा वैज्ञानिक विज्ञान की और मानवता की सेवा में क्या नहीं कर सकता, इसका जीता जागता उदाहरण डॉ बैरी जेम्स मार्शल हैं। जानते हैं डॉ बैरी मार्शल ने क्या किया? डॉ मार्शल ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए इस बैक्टेरिया से भरे हुए एक पेय को पी लिया। यह जानते हुए भी कि इससे उन्हें अल्सर हो सकता है। और इसका कोई पक्का इलाज भी नहीं था। लेकिन डॉ मार्शल विज्ञान के लिए यह रिस्क उठाने के लिए तैयार थे। पेय पीने के बाद जल्द ही इन्हें अल्सर हो गए और इनकी हालत खराब होने लगी। जांच के बाद जब अल्सर की पुष्टि हुई तो डॉ बैरी मार्शल ने एंटीबायोटिक दवाओं का कोर्स शुरू किया। दवा के सेवन से इनके अल्सर ठीक हो गए। इस प्रयोग के आधार पर 1985 में उन्होंने अपना पेपर "मेडिकल जर्नल ऑफ ऑस्ट्रेलिया" में छपवाया। यह शोध पत्र आज भी इस जर्नल के सबसे ज्यादा उद्धृत पत्रों में से एक है।

इस खोज के लिए 2005 में डॉ बैरी जेम्स मार्शल और इनके सहयोगी रोबिन वारेन को मेडिसिन के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा भी इन्हें ढेरों पुरस्कार मिले हैं। आज भी यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में डॉ बैरी जेम्स मार्शल पढ़ाते हैं। इसके अलावा ये अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में और पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में भी पार्ट टाइम फैकल्टी के तौर पर काम करते हैं।

डॉ बैरी जेम्स मार्शल और डॉ रोबिन वारेन हमारे समय के महान वैज्ञानिक हैं। ये गिरोल्मो फ्राकस्टोरो, रोबर्ट कोच, लुई पॉश्चर, एडवर्ड जेनर जैसे वैज्ञानिकों की परंपरा के संवाहक हैं। डॉ मार्शल व डॉ वारेन को सलाम।

साभार विज्ञान विश्व



लेख साभार डाक्टर @Navmeet

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