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"विज्ञान विश्व" से साभार 4 अवस्थाओं से आगे का विज्ञान

पदार्थ की चार अवस्थाएं होती है, जिसमें ठोस, द्रव, गैस, तथा प्लाज्मा शामिल है। सामान्यतः अधिकतर लोग सिर्फ तीन अवस्थाओं से वाकिफ है जिसमें ठोस,द्रव तथा गैस है। चौथी अवस्था प्लाज्मा की जानकारी विज्ञान के विद्यार्थियों को ही होती है। लेकिन भौतिक विज्ञानियों के बीच पदार्थ की पांचवी अवस्था Bose Einstein condensate भी चर्चित है। जिसकी भविष्यवाणी भौतिक विज्ञानी सत्येंद्र नाथ बोस ने की थी। जो बोसाँन की तनु गैस के परम शून्य ताप के समीप होने पर ही दृष्टिगोचर होती है।

इस अवस्था को ही Bose Einstein condensate कहते हैं।

पदार्थ की यह तीनों ही अवस्थाए अणुओं(परमाणु) की स्थिति के अनुसार निर्मित होती है। जैसे ठोस अवस्था में अणु एकदम पास-पास होते हैं, बिल्कुल चिपके(आंशिक रूप से) होते हैं। द्रव में अपेक्षाकृत दूर-दूर और गैस अवस्था में बेहद दूर-दूर,पदार्थ की इन तीनों ही अवस्था में हम परस्पर रूपांतरण कर सकते हैं। इसके लिए हमें ताप,दाब तथा आयतन में परिवर्तन करना होगा। जिससे पदार्थ के अणुओं की स्थिति में परिवर्तन हो।

प्रकृति में निहित प्रत्येक वस्तु पदार्थ है, जिसका द्रव्यमान है, जो स्वयं कोई स्थान घेरती हो पदार्थ है। वह फिर चाहे तत्व,अणु,परमाणु, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन,न्यूट्रॉन हो या फिर क्वार्क।

पदार्थ को हम तत्वों से मिलकर बना भी मान सकते हैं।

लेकिन यदि हम अणु और तत्व के विषय में बात करें, तो यह दोनों ही परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं। लेकिन फिर इनमें विलगता कहां है?

अणु की परिभाषा में कहें, तो अणु दो या दो से अधिक परमाणु के संयोजन से बनता हैं। वे एक ही तरह के या फिर अलग-अलग भी हो सकते हैं। इसके लिए परमाणु आपस में रासायनिक बंध द्वारा जुड़ते हैं और अणुओ का निर्माण करते हैं। लेकिन अणु स्वतंत्र होता है। वह रासायनिकअभिक्रिया में भाग नहीं लेता है। रासायनिक अभिक्रिया सिर्फ परमाणुओं के बीच होती है, जिसमें परमाणु सह- संयोजी बंध अथवा आयनिक बंध के द्वारा जुड़ते हैं और अणुओ का निर्माण करते हैं H2O , HCl NaOH , NaCl , ग्लूकोज , शक्कर , यूरिया , नाइट्रोजन यह कुछ अणुओं के उदाहरण है।

और यदि हम तत्व के विषय पर चर्चा करें तो तत्व परमाणु से ही बना है। यदि में किसी मर्तबान, जार (कांच की बोतल) में एक ही तरह के परमाणुओं को रखता हूं , तो वह तत्व कहलाएंगे। शुद्ध परमाणु भी आपस में रासायनिक बंध द्वारा जड़ते हैं।

Hydrogen Helium Lithium beryllium Boron carbon Nitrogen Oxygen iron gold silver Nickel Cobalt copper( आवर्त सारणी)

यह सब तत्व है और इन्हीं से समूचे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह, ब्रह्मांड का प्रत्येक जीव , जंतु , पेड़ , पौधे , कंकड़ ,पत्थर , मिट्टी , कुर्सी , टेबल यहां तक की वे पंचतत्व भी जिन्हें प्राचीन जिज्ञासु व्यक्तियों ने रचा था।

प्राचीन समय में पांच तत्व का वर्णन मिलता है। पश्चिमी देशों में चार तत्वों का वर्णन मिलता है।

कहा जाता था ,कि पूरी सृष्टि का निर्माण इन्हीं पंचतत्व से हुआ है जल,वायु ,अग्नि,पृथ्वी (मिट्टी) और आकाश

आज हम जानते हैं जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर बना हुआ है। वायु कई सारी गैसों का मिश्रण है, जिसमें ऑक्सीजन,कार्बन डाइऑक्साइड ,नाइट्रोजन, आर्गन तथा अन्य कई सारी गैस मौजूद है। अग्नि एक दहन अभिक्रिया है। जिसमें कार्बन(लकड़ी) ऑक्सीजन के साथ क्रिया कर, प्रकाश उर्जा उत्पन्न करती है तथा वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का दोहन होता है।

आकाश तो कोई तत्व है ही नहीं! वह तो एक खाली स्थान है। जहां पर टिमटिमाते तारों की प्रकाश आभा, पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है या तो फिर दूर-दूर तक पसरा काला घनघोर अंधेरा

प्राचीन समय में हमें परमाणु की परिकल्पना का वर्णन भी मिलता है। प्राचीन भारतीय दार्शनिक महर्षि कणाद और यूनानी दार्शनिक डैमोक्रेटस का मानना था कि पदार्थ अंततःकई सारे विभिन्न परमाणु से मिलकर बना है। बरसों पहले उनका मानना था,की समस्त पदार्थ अंततः एक अविभाज्य परमाणु से बना है।

वह हमारी वैज्ञानिक अटकलो का प्रारंभिक समय था। आज हम जानते हैं, की परमाणु मूलभूत नहीं है। और ना ही अविभाज्य! वह प्राचीन समय था और यह आधुनिक समय, जहां कल की मान्यता को आज किसी ने खंडित किया। हो सकता है आने वाले समय में आज की मान्यता को कोई कल खंडित करेगा। आज हम जिसे मूलभूत कहते हैं, क्या पता कल कोई आए और मूलभूत को अद्भुत बना दे! और उसकी भी एक अलग ही छवि हमारे सामने प्रस्तुत हो। यह विज्ञान है तोड़ मरोड़ कर जोड़ना और जुड़े हुए को तोड़ना इसकी प्रकृति है। जानने के लिए चीजों को तोड़ना मरोड़ना पड़ता है, तभी तो हम उनके विषय में बेहतर जान पाएंगे। कोई भी चीज बेहतर नहीं होती। और ना ही कोई सिद्धांत बेहतर होता है। उसे बेहतर समय के अनुरूप बनाया जाता है। संशोधन होते रहते हैं और होते रहेंगे।

खैर परमाणु को प्रारंभिक समय में मूलभूत माना गया था, वह हमारा प्राथमिक पायदान था, लेकिन आज हम परमाणु को जानते हैं लेकिन कितना बेहतर, यह नहीं जानते! आधुनिक जानकारी के अनुसार हम जानते हैं, कि परमाणु क्या है? उसकी संरचना क्या है? परमाणु जिसमें तीन कणों का जमावड़ा होता है,इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन, यह तीनों कण ही परमाणु को बनाते हैं। हाइड्रोजन परमाणु इसका अपवाद है। हाइड्रोजन परमाणु में केवल एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटोन होता है। इसमें इलेक्ट्रॉन पर ऋणआवेश होता है तथा प्रोटॉन पर धनआवेश होता है।और यह जो न्यूट्रॉन है यह कण उदासीन होता है। परमाणु जिसका आकार 10^−10 और न्यूक्लियस( केंद्र , नाभिक) का आकार10^-15 होता है।

यह कुछ-कुछ ऐसा है जैसे एक बड़ा सा गुब्बारा जिसक आकार 10000 मी. (व्यास)है तथा उसके अंदर 1मीटर व्यास का कंचा बीचोबीच स्थित हो। इस कंचे के अंदर न्यूट्रॉन और प्रोटॉन है और इलेक्ट्रॉन बाहर परिधि मै न्यूक्लियस के चक्कर लगाता है जुगनू की तरह, जिस तरह जुगनू अंधेरी रात में लपलपाते हैं, जब जुगनू प्रकाशित होता हैं तो हमें दिखाई देता है और जैसे ही कुछ क्षणों के लिए उसकी प्रकाश आभा खत्म होती है, वह हमारी आंखों के सामने से ओझल हो जाता है। लेकिन इलेक्ट्रॉन कोई जुगनू नहीं है!

इलेक्ट्रॉन परमाणु के अंदर सुपर पोजीशन में होता है। यानी कि वह उस समय हर जगह मौजूद होता है। लेकिन हम उसकी स्थिति को सटीकता से नहीं बता सकते, केवल उसकी स्थिति की प्रायिकता निकाल सकते हैं। उस समय, उस क्षण वह हर जगह अपनी मौजूदगी जाहिर करता है, जब तक कि उसका निरीक्षण ना किया जाए। जैसे ही हम इलेक्ट्रॉन की स्थिति को जज ( निरीक्षण) करेंगे वह अपनी स्थिति कि, कहीं और ही जाकर प्रस्तुति दे रहा होगा!

सुपरपोजिशन एक ऐसी स्थिति है जिसमें कोई भी पार्टिकल्स हर संभव स्थिति में होता है, जब तक की हम उसका निरीक्षण ना करें।

इलेक्ट्रॉन एक अलग ही तरह का गुण प्रदर्शित करता है क्योंकि इलेक्ट्रॉन कण की भी प्रकृति लिए हुए है और तरंग की भी! दोनों ही स्थिति में वह सही है। इलेक्ट्रॉन कण भी है और तरंग भी, वह दोनों ही गुण प्रस्तुत करता है। क्वांटम जगत में सुक्ष्म कण हमारे साथ आंख-मिचोली खेलते हैं।


(मेरा मानना है क्वांटम जगत वह दहलीज़ है, जहां पर पदार्थ और उर्जा दहलीज़ के अंदर और बाहर होते हुए अपने रूपों को परिवर्तित करते हैं। कण तो दोनों ही गुण एक साथ प्रदर्शित करता है!)

इस वार्ता को हम यहीं समाप्त करते हैं, और आगे चलते हैं। परमाणु के और थोड़ा अंदर परमाणु जो आकृति में बिल्कुल एक अति सूक्ष्म कण है, लेकिन इस कण के अंदर, जैसा कि मैंने बताया इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन होते हैं। जो इसको सरचना देते हैं। इसके नाभिक में स्थित न्यूट्रॉन और प्रोटॉन जो कंपन करते हैं, जिसके फलस्वरूप पूरा का पूरा परमाणु कंपन करता है।

और यदि ऐसा है, तो आपके सामने रखी कुर्सी, टेबल, मेज पुस्तक और आपका पूरा का पूरा मकान, आप खुद भी! कंपन कर रहे हैं। यह कंपन ऊर्जा के कारण है। ऊर्जा जो प्रत्येक वस्तु में तापमान के रूप में होती है। आपका जितना अधिक तापमान होगा उतनी ही तेजी से आपके शरीर को बनाने वाले परमाणु कंपन करोगें और जितना न्यून तापमान होगा उतने ही आपके परमाणु धीमे कंपन करेंगें! है ना मजेदार!थोड़ा आश्चर्यजनक जरूर है, लेकिन यही विज्ञान है! विज्ञान के यही मायने हैं।

न्यूट्रॉन और प्रोटॉन क्वार्क से मिलकर बने हैं क्वार्क की 6 तरह की किस्में होती है अप, डाउन, स्ट्रेंज (1960),चार्म्ड 1974, बाॅटम 1977 तथा टाँप 1995 क्वार्क भी प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के अंदर वाइब्रेशन करते हैं क्वार्क अस्थाई कण है, यह समय के बहुत ही छोटे पल में बनते हैं, और कुछ ही क्षणों में विलुप्त हो जाते हैं। इनका बनना-बिगड़ना चलता रहता है। यह क्वांटम क्षेत्र होता है यहां पर.... यहां पर भौतिकी के नियम विरले ही चलते हैं। यहां इनकी स्थिति हम न्यूटन के गति के नियमों से नहीं बता सकते। इनकी स्थिति और इनकी गति को बताने के लिए हमें सांख्यिकी का अनुसरण करना पड़ता है। जो मात्र प्रायिकता ही होती है।


तब विज्ञान संभावनाएं बनाता था, कल्पनाएं करता था। वह सोचता था ऐसा नहीं होता है, तो ऐसा होता होगा। वह प्रारंभिक विज्ञान था।

लेकिन अब गणितीय भाषा का सिद्धांत, गणित और भौतिकी के नियमों में पिरोया हुआ विज्ञान, तरह-तरह के गणितीय सिद्धांत प्रस्तुत करता है। जिसमें समीकरणे बनाती है, मिटाती है और प्रस्तुत करती है।

इन समीकरणों के दौर में एक नया सिद्धांत, जिसे स्ट्रिंग सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। जो यह कहता है की पदार्थ के जो मूलभूत कण है। वह एक तंतु-नुमा धागे की संरचना है, जिसे स्ट्रिंग कहते हैं। जो वाइब्रेशन करती है और इसी वाइब्रेशन के फलस्वरुप इसकी ऊर्जा को नापा जाता है। जिस कण की जितनी उर्जा होती है उतनी ही तेजी से वह वाइब्रेशन करता है। एक स्ट्रिंग कई तरह से स्पिन और कंपन कर सकती है। और कई सारे कणों को प्रदर्शित कर सकती है। यह सिद्धांत अभी तक विज्ञान के बाहरी दरवाजे पर ही खड़ा है, क्योंकि इसके बहुत से ऐसे रूप है जो विज्ञान नहीं स्वीकार कर सकता। इसे स्वीकार लेने से विज्ञान उलझ जाएगा। लेकिन हाल-फिलहाल ये सिद्धांत विज्ञान के क्षेत्र में बड़ा प्रसिद्ध है। क्योंकि जब तक विज्ञान किसी चीज को परख़ नहीं लेता वह विज्ञान कि आज ही नहीं जिस दिन इस सिद्धांत की पुष्टि हो जाएगी, की यह सही है या एक सिद्धांत मात्र, सिद्धांत आप गणित में तोड़ मरोड़ कर बेहद बना सकते हैं।

गणित के सिद्धांत अपने आप में सत्य और असत्य को प्रस्तुत करते हैं लेकिन फिर भी गणित विज्ञान की भाषा है और इसी में उसका अर्थ है। बिना गणित के विज्ञान गूंगी है। उसे पढ़ने के लिए हमें गणित की आवश्यकता होती है।

परमाणु यहां पर समाप्त नहीं होता है वह आगे अंदर और भी होगा! शायद उसकी और भी स्थितियां होगी! क्योंकि वह दौर भी था जब हमने परमाणु को मूलभूत माना था। और आज यह दौर भी है जहां परमाणु परत-दर-परत खुलता ही गया और नन्हे-मुन्ने कण आज हमारे सामने उपस्थित हैं। इन कणों की बनावट समझना सिद्धांत और प्रयोग बस आंकड़े ही हमारे पास है इन्हें देखना हमारे बस की बात नहीं। क्योंकि जिस दृश्य प्रकाश की किरणों को हम देख सकते हैं उनकी तरंगधैर्य और इनकी तरंगधैर्य में एक लंबा फासला है। उसको मिटाने के लिए हमने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप बनाया था लेकिन इसकी तरंग धैर्य भी इन नन्हे मुन्ने कोणों की तरंग धैर्य से बेहद बड़ी है, इस कारण हम इन नन्हे-मुन्ने कणों को नहीं देख सकते। hydrogen परमाणु की संरचना को हम इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देख सकते हैं लेकिन वह भी कुछ उपयुक्त डाटा प्रस्तुत नहीं करती।

आपके ज़हन में एक बात जरुर आती होगी। आखिर...! वैज्ञानिक इन सूक्ष्म कणों को खोजते कैसे हैं?


परमाणुओं को तेजी से त्वरित कर आपस में टकराया जाता है। जिससे वह छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और उनकी अंदरूनी संरचना हमारे सामने आती है। परमाणु को त्वरित करने का कार्य बड़ी-बड़ी कण त्वरक मशीनों में होता है। यह बेहद विशाल ट्यूब की एक लंबी नली होती है जिसके अंदर निर्वात होता है। और उस निर्वात में ही भागते दौड़ते परमाणु आपस में टकराते हैं और छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और फिर वैज्ञानिक इन पर अध्ययन करते हैं।


परमाणु के बाहर आने पर हम देखते हैं की परमाणुओं से मिलकर अणु , अणु से मिलकर तत्व, तत्वों से मिलकर पदार्थ बनता है। और पदार्थ जो हमारे चारों ओर दृष्टिगोचर है। जिसे हम देख सकते हैं, हमारी आंखों से, क्योंकि दृश्य प्रकाश की किरणें इन से टकराती है और हमारे चक्षु पर आपतीत होती है। जिससे हमारे दृष्टि पटल पर उनका चित्र बनता है। और हम उनके रंगों और गुणों के आधार पर इनका वर्गीकरण करते हैं, इनका अध्ययन करते हैं। ढूंढते हैं, आख़िर यह सब अस्तित्व में आया कहां से? यह किससे बना है? और परत दर परत इसे खोलते हैं और फिर वही सिलसिला, पदार्थ तत्वों से मिलकर बना है। तत्व अणु से, अणु परमाणु का समूह है और परमाणु, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बना है। और इनके विषय में क्या कहा जाए? और आगे जाना चाहते हैं! है ना मजेदार पदार्थ की कहानी जो हमारे अस्तित्व को टटौल्ती है।


साभार : Rajesh mewade


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