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सबको सम्मान दें ©डॉ आनंद प्रदीक्षित

Updated: Apr 11, 2021

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वर्ण व्यवस्था पर नव चिंतन

👉मैं यह मानता हूं कि यदि आप मनुष्य हैं तो आपके साथ कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई हैं। यह विशेषताएं गुण अवगुण नहीं होती। समाज में जब लोग आपको जज करते हैं तो आपकी विशेषताओं को गुण अवगुण कहते हैं और इस परंपरा को देखते हुए हमने आपने कुछ विशेषताओं को गुण और कुछ को अवगुण मान लिया है ।जैसे कोई क्रोधी है तो यह अवगुण है कोई दयालु है तो यह गुण है कोई विनम्र है तो गुण है और यदि कोई स्पष्ट वादी है तो वह अवगुण है ।किंतु ऐसा नहीं है कोई भी विशेषता या ट्रेट पूर्णतया न तो गुण होती है ना अवगुण ।अधिक दयालु का लाभ लोग उठाते हैं और तब उसे एक दिन समझ में आता है कि अधिक दया करना उचित नहीं है। क्रोध यदि ना किया जाए तो बहुत से लोगों को समझ में ही नहीं आता है कि वह गलत है। हम भले ही किसी को जज ना करें लेकिन फिर भी जब लोग हमारी विनम्रता को हमारी कमजोरी समझ लेते हैं तो हमें क्रोध भी करना होता है ।उन्हें सबक भी सिखाना होता है और बल का प्रयोग भी करना पड़ता है यदि हमारे अंदर शक्ति है। यदि शक्ति नहीं है तो बात अलग।

कई बार ऐसा लगता है कि विनम्रता शक्तिहीन की मजबूरी है ।

शांति अच्छा गुण है किंतु सदैव नहीं ।शांति से आक्रमणों का सामना नहीं किया जा सकता शांति से युद्ध नहीं जीते जा सकते आक्रामक पड़ोसी को सबक नहीं सिखाया जा सकता ।इसके बिना

हमारे जीवन में विष घोलने वालों को जवाब नहीं दिया जा सकता। अतः यह भी आवश्यक है ।किंतु कुछ शीलगुण अर्थात ट्रेट हमारे आंतरिक होते हैं जैसे कि ईर्ष्या । यह तो लाभ नहीं पहुंचाता है अतः इस से दूर रहना चाहिए ।यदि इस को प्रेरणा रूप में ले ले अर्थात प्रेरणा में परिवर्तित कर लें तो अच्छा है । प्रतिस्पर्धा की जाए और बड़ा बना जाए तो अच्छी बात है। केवल ईर्ष्या सिर्फ दग्ध करती है अतः उचित नहीं है ।

क्रोध बुरा है पर यह देखा गया है कि बड़े पहुंचे हुए संत ऋषि मुनि भी बहुत क्रोधी होते रहे हैं दुर्वासा ऋषि को सभी जानते हैं कुछ विनम्र ऋषि मुनि भी रहे हैं जैसे गुरु वशिष्ठ लेकिन उन्हें इक्ष्वाकु वंश के दशरथ जैसे सम्राट ने राजपुरोहित बनाया था तो उन्हें किसी पर क्रोध करने की या ईर्ष्या करने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी।

क्रोध कौन नहीं करता? व्यापारी नहीं करता, धंधा करने वाला नहीं करता क्योंकि धंधे में इसका कोई स्थान नहीं है।

ग्राहक को नाराज नहीं किया जा सकता ।कस्टमर केयर पर तमाम ग्राहक प्रतिदिन करोड़ों गालियां विश्व भर में देते हैं लेकिन सामने वाला यस सर जी सर हां सर आपका दिन शुभ हो सर ऐसा नहीं है सर हम आपकी बात समझते हैं सर बड़े विनम्र भाव से यही बातें कहता रहता है ,लेश मात्र विचलित नहीं होता व्यापारी किसी भी ग्राहक से क्रोध से पेश नहीं आता क्योंकि व्यापारी सिर्फ व्यापार करने के लिए लाभ कमाने के लिए बैठा है किंतु प्रत्येक व्यापार करने वाला व्यापारी नहीं होता यदि उसे व्यापारी के संस्कार नहीं मिले। हां व्यापारी के भी संस्कार होते हैं भारत में एक वर्ण है वैश्य वर्ण वह बहुत योग्य और कर्मठ व्यापारी होते हैं इसी प्रकार सिंधी गुजराती पारसी सिख व्यापारी उत्तम व्यापारी गुणों से युक्त होते हैं और मैंने उन्हें क्रोध करते या ग्राहक से लड़ते हुए नहीं देखा है किंतु यह व्यापारिक संस्कार जिस जाति को नहीं मिले हैं उसे व्यापार करना नहीं आता। या तो पीढ़ी दर पीढ़ी को व्यापार करते रहे हो और संस्कार बस गए हो तो वह उच्च स्तरीय व्यापारी हो सकते हैं। व्यापारिक संस्कार विकसित करने के लिए कम से कम 7 पीढ़ी पुरानी परंपरा व्यापार की होनी चाहिए और यदि यह नहीं है तो व्यक्ति ठीक से व्यापार नहीं कर पाता क्योंकि वह सीधे को सीधा कहता है तेरे को टेढ़ा कहता है। ग्राहक की अनावश्यक फालतू बातों को और कुतर्कों को बर्दाश्त नहीं करता और उनसे क्रोध से पेश आता है परिणाम स्वरूप व्यापार में हानि होती है। एक सार्वत्रिक बात है अर्थात सभी जगह लागू होती है।

हमें प्रत्येक संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी मिलते हैं जैसे ब्राह्मण को पढ़ाने के संस्कार। वह जन्म से अध्यापक होता है अथवा पुरोहित होता है। इसी प्रकार क्षत्रिय संस्कार गत रूप से अपनी बात पर दृढ़ रहने वाला और मान अपमान का विशेष ध्यान रखने वाला होता है उस की जीवन शैली एक शान शौकत की जीवन शैली से प्रेरित होती है और वह वही चाहता है वह किसी भी परिस्थिति में समर्पण नहीं करना चाहता। सारे युद्ध इसी गुण के कारण जीते जाते हैं और रक्षा जैसा कठिन कार्य वह तभी कर पाता है ।सेवा क्षेत्र में जो लोग रहे हैं वह सेवा के विशेषज्ञ और उन जैसी सेवा कोई दूसरा नहीं कर पाता किंतु क्षोभ की बात यह है कि उन्हें इसका सम्मान नहीं दिया गया क्योंकि शारीरिक परिश्रम को लोग मानसिक परिश्रम की तुलना में नीचे रखते आए हैं जो कि गलत है ।सेवा कार्य करने वाले संसार में सर्वोत्तम और सर्वाधिक आवश्यक है। उनके बिना हमारा दिन न प्रारंभ हो सकता है ना समाप्त हो सकता है ।उनके बल पर ही हम सोते जागते हैं और सांस लेते हैं किंतु उन्हें हीन माना गया। लेकिन प्रशंसनीय बात यह है कि वह फिर भी सेवा किए जा रहे हैं। आज भी कर रहे हैं

आश्चर्य की बात यह है कि भगवान भक्ति से प्रसन्न होते हैं और यह वर्ग पूरे समाज की भक्ति करता है लेकिन फिर भी इसे वह सम्मान प्राप्त नहीं हुआ है ।वर्ण व्यवस्था का यह नवीन चिंतन आपके समक्ष इसलिए प्रस्तुत किया है कि आप समाज के सभी वर्गों को श्रम विभाजन की दृष्टि से देखें और किसी को नीचा ना समझे गुणों पर विशेषताओं पर जजमेंटल ना हो सभी गुणों की सदैव अच्छे नहीं होते और सदैव बुरे नहीं होते।


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