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समसामयिकी 19.4.21


ECONOMY

1.2 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पटरी पर लौटने के संकेत:खपत बढ़ने से अमेरिका में बैंकों को तीन गुना मुनाफा, चीन ने फिर चौंकाया, विकास दर में 18% से ज्यादा ग्रोथ

• अमेरिकी अर्थव्यवस्था कोविड-19 महामारी शुरू होने से पहले वाली स्थिति में लौटती नजर आ रही है। 2021 की पहली तिमाही में बैंकों को हुआ जोरदार मुनाफा इसका ठोस संकेत है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बैंकिंग बिजनेस बढ़ने का सीधा मतलब खपत बढ़ना माना जाता है। यानी बाजार में गतिविधियां बढ़ी हैं। जनवरी-मार्च तिमाही में बैंक ऑफ अमेरिका का मुनाफा सालाना आधार पर दोगुना और सिटीग्रुप का तीन गुना हो गया।

• रिटर्न ऑन इक्विटी (आरओई) यानी पूंजी के हिसाब से मुनाफे की बात करें तो इस मामले में सिटीग्रुप के निवेशकों ने 20%, जेपी मॉर्गन के निवेशकों ने 29% और गोल्डमैन सैक्स के निवेशकों ने 33% ग्रोथ हासिल की है। बैंकों के शेयरधारकों ने एक दशक से ज्यादा समय से इतना रिटर्न नहीं पाया था। दरअसल, अमेरिका में अब तक कोविड-19 वैक्सीन के करीब 20 करोड़ डोज लगाए जा चुके हैं।

• इसका असर यह हुआ कि बार, रेस्टोरेंट्स, रिटेल स्टोर और मॉल में भीड़ बढ़ने लगी। खपत बढ़ी और बैंकिंग बिजनेस नई ऊंचाई पर पहुंच गया। ऐसा इसलिए हुआ कि अमेरिका में कैश की जगह क्रेडिट कार्ड ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं। इससे बैंकों को बड़ा बिजनेस हाथ लगता है। इसीलिए बैंकों का बिजनेस बढ़ना खपत बढ़ने का संकेत होता है।

• जनवरी-मार्च तिमाही में कई अन्य फैक्टर्स ने भी अमेरिका के बैंकिंग सेक्टर को सपोर्ट किया। शेयर बाजार में ट्रेडिंग बढ़ना भी इसमें शामिल है। स्टॉक मार्केट और बॉन्ड मार्केट में रिटेल ट्रेडिंग बढ़ने की वजह से जेपी मोर्गन की इंवेस्टमेंट बैंकिंग यूनिट का मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

• इसी तरह 2020 की चौथी तिमाही के मुकाबले 2021 की पहली तिमाही में गोल्डमैन सैक्स का इक्विटी-अंडरराइटिंग रिवेन्यू 40% बढ़ गया। इस बीच खास तौर पर अधिग्रहण के मकसद से बनाई गई कंपनियों (स्पेक्स) का चलन बढ़ने से सिटीग्रुप के इंवेस्टमेंट बैंक की आय में 50% से ज्यादा उछाल आया।

सरकारी मदद मिली, इसलिए भी चीन ने हासिल की उपलब्धि


• महामारी के बीच चीन ने जनवरी-मार्च तिमाही में रिकॉर्ड 18.3% जीडीपी ग्रोथ हासिल करके दुनिया को चौंका दिया। वहां निर्यात और घरेलू बाजार में अच्छी मांग के साथ-साथ छोटे कारोबारियों को लगातार सरकारी मदद मिलने की बदौलत यह उपलब्धि हासिल हो पाई।

• वैसे यह बढ़त बेस इफेक्ट का भी नतीजा है, क्योंकि चीन ने बाकी देशों से पहले ही कुछ शहरों में लॉकडाउन जैसे उपाय किए थे और वह कोरोना से निपटने में सबसे आगे रहा था। कोरोना संकट के चलते पिछले साल चीन और भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं मंदी में थीं। लेकिन, चीन सिर्फ दो तिमाहियों में ही संकट से उभर आया।


2. विदेशी मुद्रा भंडार 4.34 अरब डॉलर बढ़कर 581.21 अरब डॉलर पर पहुंचा

• देश का विदेशी मुद्रा भंडार नौ अप्रैल को समाप्त सप्ताह में 4.34 अरब डॉलर बढ़कर 581.21 अरब डॉलर हो गया। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के शुक्रवार को जारी आंकड़ों में यह जानकारी दी गई है। दो अप्रैल को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 2.42 अरब डॉलर घटकर 576.28 अरब डॉलर और 26 मार्च 2021 को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 2.99 अरब डॉलर घटकर 579.28 अरब डॉलर रह गया था।

• विदेशीमुद्रा भंडार, 29 जनवरी, 2021 को समाप्त सप्ताह में 590.18 अरब डॉलर के अब तक के उच्चतम स्तार पर था। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार नौ अप्रैल 2021 को समाप्त समीक्षाधीन सप्ताह में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (एफसीए) के बढ़ने की वजह विदेशी मुद्राभंडार में बढ़त हुई है। विदेशीमुद्रा परिसंपत्तियां, कुल विदेशी मुद्रा भंडार का मुख्य हिस्सा हैं। रिजर्व बैंक के साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार समीक्षाधीन अवधि में एफसीए 3.02 अरब डॉलर बढ़कर 539.45 अरब डॉलर हो गयीं। एफसीए को दर्शाया डॉलर में जाता है, लेकिन इसमें यूरो, पौंड और येन जैसी अन्य विदेशी मुद्रा सम्पत्तियां भी शामिल होती हैं।

स्वर्ण भंडार 1.30 अरब डॉलर बढ़ा

• रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार समीक्षाधीन सप्ताह में देश का स्वर्ण आरक्षित भंडार 1.30 अरब डॉलर बढ़कर 35.32 अरब डॉलर हो गया। आंकड़ों के अनुसार, समीक्षाधीन सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय मु्द्रा कोष (आईएमएफ) में प्राप्त विशेष आहरण अधिकार 60 लाख डॉलर बढ़कर 1.49 अरब डॉलर हो गया। इसी तरह आईएमएफ के पास आरक्षित मुद्रा भंडार भी 2.4 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.95 अरब डॉलर हो गया।


SCIENCE


3. पृथ्वी पर गिरती अंतरिक्ष की धूल, अंतरिक्ष चट्टानों ने निभाई जीवन के विकास में अहम भूमिका

• हर साल करीब पांच हजार टन ब्रह्मांडीय धूल पृथ्वी पर गिरती है। इसमें मुख्यत: उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों के बारीक कण होते हैं। एक नए अध्ययन के अनुसार इस धूल की मात्र पृथ्वी पर गिरने वाली अंतरिक्ष की चट्टानों की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। पृथ्वी पर हर साल करीब दस टन बड़ी चट्टानें गिरती हैं।

• अंतरिक्ष की धूल की भारी मात्र के बावजूद इसे खोज पाना मुश्किल होता है। बारिश की वजह से यह धूल बह जाती है और कई स्थानों पर पृथ्वी की अपनी धूल इस धूल को ढक देती है, लेकिन अंटार्कटिका में शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष की धूल को एकत्र करने का तरीका विकसित कर लिया है।

• फ्रांस के राष्ट्रीय विज्ञान अनुसंधान केंद्र के भौतिकविद ज्यां दुप्रो और उनके सहयोगियों ने इस इलाके से अंतरिक्ष धूल एकत्र करने के लिए 20 वर्षो में छह अभियान आयोजित किए हैं। इस इलाके में अंतरिक्ष की धूल की परतें पूरी तरह से सुरक्षित हैं।

• इन परतों के आधार पर यह अनुमान लगा सकते हैं कि हर साल अंतरिक्ष से कितनी धूल पृथ्वी पर गिरती है। शोधकर्ताओं ने इस इलाके में खाइयां खोदकर 20 किलो के बैरल में बर्फ की परतों को जमा किया। बैरल को रिसर्च स्टेशन की प्रयोगशाला में सावधानीपूर्वक बर्फ की परतों को पिघलाया। बर्फ के पिघलने के बाद बची धूल के कणों को अलग कर शोधकर्ताओं ने सुनिश्चित किया कि इन नमूनों में उनके अपने दस्तानों से किसी तरह की दूसरी मिलावट न होने पाए।

• मध्य अंटार्कटिका में एकत्र किए गए बर्फ के नमूनों के विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि करीब 5,200 टन अंतरिक्ष की धूल हर साल पृथ्वी पर गिरती है। इन धूल कणों का व्यास 30 से लेकर 200 माइक्रोमीटर के बीच होता है। इस प्रकार ये सूक्ष्म कण पृथ्वी पर पारलौकिक पदार्थ के सबसे बड़े स्नोत हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट करने वाली अधिकांश अंतरिक्ष शिलाएं जल जाती हैं। इससे पृथ्वी पर गिरने वाली धूल की मात्र कम हो जाती है। हर साल करीब 15,000 टन धूल वायुमंडल में दाखिल होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब एक-तिहाई हिस्सा ही पृथ्वी पर पहुंच पाता है।

• शोधकर्ताओं का कहना है कि 80 प्रतिशत धूल संभवत: कुछ खास धूमकेतुओं से आती है। छोटी कक्षा वाले ये धूमकेतु बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से नियंत्रित होते हैं। करीब 20 प्रतिशत धूल संभवत: क्षुद्रग्रहों से आती है। पृथ्वी पर गिरने वाले पारलौकिक पदार्थो का अध्ययन खगोल-भौतिकी और भू-भौतिकी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पृथ्वी पर इस समय मौजूद कई तत्व संभवत: अंतरिक्ष की चट्टानों द्वारा लाए गए थे। कुछ सिद्धांतों के अनुसार अंतरिक्ष की चट्टानों के जरिये आने वाले तत्वों और मॉलिक्यूल्स ने पृथ्वी पर जीवन के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


ENVIRONMENT


4. वातावरण में 300 साल की तुलना में 50% ज्यादा बढ़ी कार्बन डाइऑक्साइड, इसकी 25% मात्रा को बढ़ने में लगे थे 200 साल

• हमारे पर्यावरण में काॅर्बन-डाइऑक्साइड (सीओ2) गैस का उत्सर्जन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2021 अब तक का सबसे ज्यादा गर्म साल हाे सकता है।

• एक अध्ययन में रिसर्चर्स ने बताया कि सीओ2 स्तर इस साल के अंत तक 18वीं सदी (करीब 300 साल पहले) में हुई औद्योगिक क्रांति के पहले हो रहे मानव जनित काॅर्बन उत्सर्जन के स्तर से 50% ज्यादा हो जाएगा। इसका मतलब है कि सीओ2 का स्तर 18वीं सदी के स्तर से डेढ़ गुना के करीब बढ़ेगा।

• हालिया स्टडी में अमेरिका और ब्रिटेन के रिसर्चर्स ने हवाई और बर्फीले इलाके के सीओ2 डेटा का िवश्लेषण किया है। इसमें पाया कि 1750-1800 में सीओ2 का औसत स्तर 278 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) था। वहीं मार्च 2021 में हमारे वायुमंडल में सीओ2 का स्तर 417.14 पीपीएम तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि मई तक काॅर्बन उत्सर्जन और बढ़ेगा। साथ ही, 2021 में इसका औसत 419.5 पीपीएम पर पहुंच जाएगा।

नाटकीय परिवर्तन एक मानव उल्कापिंड पृथ्वी की तरह


• विश्लेषण से पता चला कि 1760 के आसपास शुरू हुआ कार्बन-डाइऑक्साइड मार्च 2021 तक एक नए स्तर पर पहुंच चुका है। लंदन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साइमन लुईस ने कहा कि वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा को 25% बढ़ने में 200 साल लगा, जबकि औद्याेगिक क्रांति के पूर्व के स्तर से यह सिर्फ 30 साल में 50% से ऊपर पहुंच गया। यह नाटकीय परिवर्तन एक मानव उल्कापिंड पृथ्वी की तरह है।


Source of the News (With Regards):- compile by Dr Sanjan,Dainik Jagran(Rashtriya Sanskaran),Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)

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