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समाचार विचार

वायरस का नया रूप हमारी चिंता क्यों बढ़ा रहा है

(अनिर्बाण महापात्र, सूक्ष्म जीव-विज्ञानी)

(साभार हिंदुस्तान )


कोविड-19 की दूसरी लहर में हम अब यह जानते हैं कि बी.1.617 (जिसे पहले स्पाइक प्रोटीन में दो बदलावों की वजह से ‘डबल म्यूटेंट वेरिएंट’ कहा जाता था) के कारण संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। एक अन्य वेरिएंट जो तेज संक्रमण फैला रहा है, वह है बी.1.1.7, जिसे सबसे पहले ब्रिटेन में पहचाना गया था। कोरोना वायरस के पहले वेरिएंट की तुलना में बी.1.1.7 कहीं तेजी से संक्रमित करता है और कहीं अधिक गंभीर बीमार कर सकता है। हालांकि, इसे ‘इम्यून-एस्केप’ (जब शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र वायरस के खिलाफ काम नहीं करता) नहीं माना जाता, क्योंकि एक बार बीमार पड़ने के बाद इस वेरिएंट से दोबारा संक्रमित होने के मामले नहीं के बराबर हैं। इस पर टीका भी कारगर है। दो अन्य म्यूटेंट बी.1.351 (दक्षिण अफ्रीका में इसे सबसे पहले पहचाना गया) और पी.1 (जिसे ब्राजील में देखा गया) भी चिंतनीय हैं। ये तेजी से फैलते हैं। इन दोनों वेरिएंट में स्पाइक प्रोटीन की पहचान नहीं हो सकी है। इनको ‘इम्यून-एस्केप’ वेरिएंट कहा जाता है, क्योंकि इसमें दोबारा संक्रमण आम है और टीके भी इनके खिलाफ कम कारगर होते हैं।

अभी यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि बी.1.617 वुहान में पहचाने गए मूल वायरस से कहीं अधिक संक्रामक है, और मोटे तौर पर बी.1.1.7 वेरिएंट के समान है। इस धारणा की वजह भारत और अन्य जगहों पर संक्रमण में हुई तेजी वृद्धि है। हमारे पास कुछ प्रारंभिक नतीजे भी हैं, जो बताते हैं कि बी.1.617 वेरिएंट के परिवर्तित स्पाइक किस तरह से कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं। मार्कस हॉफमैन और उनके सहयोगियों ने कोशिकाओं में वायरस के प्रवेश को जांचने के लिए एक शुरुआती अध्ययन किया, (बायोरेक्सिव पर इसे अपलोड किया गया है), जिसमें बी.1.617 कोरोना वायरस स्पाइक से लिपटे एक अलग वायरस का उपयोग किया गया। मूल वायरस के वायरल स्पाइक की तुलना में म्यूटेट स्पाइक वाले वायरस दो प्रकार की कोशिकाओं में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से प्रवेश कर सकते हैं। मगर इन शुरुआती परिणामों को पुष्ट करने के लिए अभी और अध्ययन की दरकार है। वैज्ञानिक प्रज्ञा यादव और उनकी टीम के शुरुआती काम से भी संकेत मिलता है कि बी.1.617 कहीं अधिक गंभीर बीमार कर सकता है। इस दूसरी लहर में पूरा परिवार संक्रमित हो रहा है। नौजवान और जिन्हें सह-रुग्णता यानी कोई दूसरी बीमारी नहीं है, वे भी जान गंवा रहे हैं। मगर यह तय होना अभी बाकी है कि सामान्य रूप से अधिक लोगों के संक्रमित होने के कारण या वेरिएंट में जैविक बदलावों की वजह से ऐसा हो रहा है।

इनमें से कोई भी अच्छी खबर नहीं है। मगर कुछ हद तक अच्छी खबर यह है कि बी.1.617 पॉलीक्लोनल एंटीबॉडी की प्रतिरक्षा तंत्र से बचता नहीं दिखता। यह एंटीबॉडी वायरस के विभिन्न हिस्सों पर हमला बोलता है। बी.1.351 वेरिएंट में स्पाइक में बदलाव की वजह से वायरस कई बार पूर्व-संक्रमण या टीकाकरण की वजह से बनने वाले एंटीबॉडी को धोखा दे सकता है। इससे टीके से सुरक्षा पाने की कोशिश को चोट पहुंचेगी। पिछले कुछ दिनों के अध्ययनों से पता चला है कि पूर्व में संक्रमित या टीका लगा चुके लोगों के खून के नमूने में प्राप्त एंटीबॉडी बी.1.617 वेरिएंट को कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकते हैं। हालांकि, तमाम टीकों के बहुत प्रारंभिक आंकड़े ही अभी उपलब्ध हैं। एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि मूल वायरस की तुलना में बी.1.617 में एटीबॉडी की तत्परता आधे से कम हो गई थी। टीकाकरण के मामले में दो समूहों ने पाया कि फाइजर की दोनों खुराक देने के बाद मूल वायरस की तुलना में बी.1.617 एंटीबॉडी को कम निष्क्रिय कर पाया। बहरहाल, भारत में कुछ लोग पूर्ण टीकाकरण के बाद भी कोविड-19 से गंभीर रूप से पीड़ित हुए। कुछ दिल दहला देने वाली कहानियां भी हैं, लेकिन हम अब भी नहीं जानते कि ऐसा किन परिस्थितियों में हो रहा है। अब तक हमारे पास जो आंकड़े हैं, वे वैक्सीन से कुछ हद तक सुरक्षा की बात ही साबित करते हैं, इसलिए ऐसे गंभीर मामले दुर्लभ हैं। आने वाले दिनों में, हमें इस बात की अधिक जानकारी होगी कि ये वैज्ञानिक नतीजे दुनिया में टीके की प्रभावशीलता से कितने जुड़े हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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