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पूर्वी एशिया या लातिन अमेरिका?


(टी. एन. नाइनन)

(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड )


कोविड-19 की दूसरी लहर के संक्रमण के बीच अर्थशास्त्रियों ने वृद्धि अनुमानोंं में कमी करनी शुरू कर दी है। अधिकांश टीकाकार इस बात से सहमत हैं कि वर्ष के अंत में अर्थव्यवस्था एक बार फिर वहां होनी चाहिए जहां वह दो वर्ष पहले थी। सवाल यह है कि उसके बाद क्या होगा? क्या दोबारा तेज आर्थिक वृद्धि की वापसी अपेक्षित है या फिर देश मध्यम अवधि में निराश माहौल की ओर बढ़ रहा है? इसका जवाब पाने के लिए हालिया वृद्धि दरों पर एक नजर डालनी होगी।


पहली बात, जैसा कि हम सब जानते हैं कि कोविड के आगमन के पहले ही मंदी शुरू हो गई थी। वृद्धि दर मोदी के कार्यकाल के 8 फीसदी के उच्चतम स्तर से गिरकर 2019-20 में 4 फीसदी रह गई थी। दूसरी बात, विगत तीन वर्षों में सरकारी खपत ने ही वृद्धि को गति दी है। इस अवधि में सरकारी व्यय 30 प्रतिशत बढ़ा है जबकि निजी खपत में 2.1 फीसदी का इजाफा हुआ। तयशुदा पूंजी में निवेश की स्थिति और बिगड़ी और यह तीन वर्ष पहले के स्तर की तुलना में 8.7 फीसदी कम हो गया। मंदी के दौर में सरकार का वृद्धि का प्रमुख माध्यम बनना समझा जा सकता है लेकिन इस स्थिति के अपने जोखिम हैं। इसे उस समय तो कतई नहीं जारी रखा जा सकता है जबकि सार्वजनिक ऋण पहले ही जीडीपी के दो तिहाई से उसके 90 फीसदी तक जा पहुंचा हो।


तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, रोजगार घटने और असमानता में इजाफे के कारण निजी खपत में जल्दी सुधार होना मुश्किल है। आबादी मेंं काम करने के इच्छुक लोग घटे हैं। इन सीमित होते आंकड़ों के बीच भी बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है। जो लोग वास्तव में काम कर रहे हैं, उनमें भी कृषि जैसे अल्प आय वाले रोजगार में ज्यादा लोग हैं। इस बीच औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में लाखों रोजगार समाप्त हो गए हैं। ऐसे में ज्यादातर लोगों के लिए व्यय का वर्तमान स्तर बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।


खपत धीमी होने और क्षमता के सीमित प्रयोग के कारण नई क्षमता में निवेश के हालात बनने में दो से तीन वर्ष का समय लगेगा। इस बीच निवेश मेंं कम वृद्धि के साथ समग्र स्तर पर तीव्र वृद्धि मिलना मुश्किल है। जब तक आप निर्यात मांग से घरेलू मांग की भरपाई नहीं करते कम से कम तब तक ऐसा होगा। अब यह संभव है क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और कारोबार बेहतरी पर है। पश्चिमी देश अपनी आपूर्ति चीन से परे करना चाह रहे हैं। इसके लिए ऐसी नीतियां चाहिए जो निर्यातकों की मदद करें। परंतु लगता नहीं कि आत्मनिर्भर अभियान इसमें मददगार होगा।


कोई नहीं चाहता कि लातिन अमेरिका जैसी स्थिति हो जाए। भारत में बढ़ती असमानता काफी कुछ वैसी ही हो रही है। इतना ही नहीं लातिन अमेरिका जैसा अमीर और गरीब का अंतर अब भारत में भी नजर आने लगा है। चुनिंदा बड़ी कंपनियों के दम पर फलता-फूलता शेयर बाजार अच्छा लग सकता है लेकिन शेष तंत्र पूरी तरह दबाव में है। लातिन अमेरिका जैसी तीव्र असमानता घरेलू मांग और वृद्धि की राह रोकती है। खासकर तब जबकि ज्यादातर लोग अच्छी तरह शिक्षित और उच्च उत्पादक रोजगार के लायक नहीं हैं।


नीति निर्माताओं को ग्रेट गैट्सबी कर्व (स्कॉट फिट्जराल्ड का उपन्यास और इसी नाम से बनी फिल्म) पर नजर डालनी चाहिए जिसने बढ़ते अधिशेष के बीच अमेरिकी असमानता और वर्गभेद को समाप्त करने में मदद की। कर्व दो मापकों के एक दूसरे को काटने का अध्ययन करता है। एक है असमानता और दूसरा अंतर-पीढ़ीगत बदलाव या इस बात की संभावना कि अगली पीढ़ी की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और वह कम आय से औसत आय की स्थिति में आएगी। उत्तरी यूरोप और उत्तर अटलांटिक देशों का प्रदर्शन इस मोर्चे पर बेहतर रहा। पूर्वी एशिया का स्तर बहुत अच्छा नहीं रहा लेकिन बड़ी लातिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था वाले देशों का प्रदर्शन सबसे बुरा रहा। यदि भारत में भारी असमानता के साथ आर्थिक स्थिति में पीढ़ीगत बदलाव भी कमजोर रहा तो जोखिम है कि वह तेज वृद्धि वाले पूर्वी एशिया के बजाय कमजोर प्रदर्शन वाले लातिन अमेरिका जैसा बन जाएगा।


यदि हम राजकोषीय प्रबंधन में सफल रहे तो इस खराब नतीजे से बच सकते हैं। इसके लिए राजस्व बढ़ाने वाले उपायों की मदद से व्यय को समर्थन देना होगा। यदि स्कूली शिक्षा में सुधार में निवेश किया जाए, श्रम आधारित लेकिन मूल्यवर्धित रोजगार में इजाफा किया जाए तो लाभ हो सकता है। बढ़ती असमानता और गुणवत्तापूर्ण रोजगार गंवाने की अनदेखी करने वाली नीतियों की बदौलत कमजोर वृद्धि हासिल होगी। इससे सामाजिक और राजनीतिक दबाव पैदा होगा जो उन हालात की ओर ले जाएगा जो लातिन अमेरिका में प्रचुरता से दिखाई देते हैं: यानी लोकलुभावन और अधिनायकवादी लोकतंत्र।

🛑हमारी मुश्किलें न बढ़ा दे कहीं अंतरिक्ष का मलबा

(जसप्रीत बिंद्रा, तकनीक विशेषज्ञ)

(साभार हिंदुस्तान )


गोसिनी और उडरजो द्वारा लिखित कालजयी एस्ट्रिक्स कॉमिक्स शृंखला में गॉलवासियों की एकमात्र चिंता यही थी कि कहीं आसमान उनके सिर पर न गिर जाए। कोविड से लड़ती दुनिया में यह डर फिर से लौट आया, जब खबर आई कि चीन के लॉन्ग मार्च सैटेलाइट का 23 टन वजन वाला बूस्टर पृथ्वी पर गिर सकता है। बेशक हिंद महासागर में इसके गिरने से जान-माल का नुकसान नहीं हुआ, लेकिन यह खौफ खत्म नहीं हुआ है कि भविष्य में इस तरह की घटना नहीं होगी। वास्तव में, अंतरिक्ष के मलबे का यूं बेलगाम होकर घरती पर गिरने का यह चौथा मामला था। साल 1979 की घटना तो सबसे बड़ी है, जब स्काइलैब अंतरिक्ष स्टेशन अनियंत्रित होकर जमीन पर आ गिरा था।

अभी 12.8 करोड़ मानव-निर्मित वस्तुएं पृथ्वी के चक्कर लगा रही हैं। इनमें से 34 हजार का आकार 10 सेंटीमीटर से अधिक है, जबकि 3,000 ऐसे उपग्रह हैं, जिनकी सेवाएं ली जा रही हैं। 50 बेकाम हो चुके लॉन्ग मार्च के आकार वाले बूस्टर भी धरती के चारों ओर घूम रहे हैं, और वे तब तक परिक्रमा करते रहेंगे, जब तक कि उनको गिराने का फैसला नहीं लिया जाएगा। ऐसे में, कोई मलबा यदि अनियंत्रित होकर पृथ्वी से टकराएगा, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है, फिर चाहे लाखों में ऐसी कोई एक घटना होने की आशंका ही क्यों न हो। वैसे, आने वाले दिन और दिलचस्प होने वाले हैं, क्योंकि दुनिया की दो सबसे अमीर हस्तियों ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में कदम रखा है। शुरुआत एलन मस्क ने स्टारलिंक सैटेलाइट नेटवर्क के साथ की, जिसको उनकी रॉकेट कंपनी स्पेसएक्स ने बनाया है। वह पहले ही करीब 1,500 ऐसे उपग्रह अंतरिक्ष में भेज चुके हैं, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में रहेंगे। मस्क की योजना इन उपग्रहों की संख्या 12 हजार तक करने की है।

दूसरा नाम अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस का है, जो कुइपर प्रोजेक्ट पर हर साल एक अरब डॉलर की रकम खर्च कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत उनकी कंपनी ब्लू ऑरिजिन 3,000 से अधिक उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजेगी। अन्य अरबपतियों में, भारती कंपनी के सुनील मित्तल ने ब्रिटिश सरकार, सॉफ्टबैंक और ह्यूजेस नेटवर्क सिस्टम के साथ हाथ मिलाया है और वह वनवेब कंपनी के माध्यम से 650 उपग्रह भेज रहे हैं। चीन तो 13 हजार उपग्रहों का मजबूत होंगयान सिस्टम बना रहा है। अरबपति रिचर्ड ब्रानसन तो 35 हजार फुट की ऊंचाई पर उड़ रहे बोइंग 747 के पंख से रॉकेट लगे उपग्रहों को छोड़ने की योजना बना रहे हैं। आखिर इतनी आपाधापी क्यों? इसमें दो राय नहीं कि इसकी असल वजह कारोबारी अनिवार्यता है। सभी का सपना दुनिया को 5जी इंटरनेट नेटवर्क से जोड़ना है। आज भी तीन अरब लोग इंटरनेट से दूर हैं, जबकि कई कम मानक का नेटवर्क इस्तेमाल कर रहे हैं। महामारी के बाद की दुनिया में इंटरनेट से दूरी कई लोगों को रोजगार से, बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से और दूरदराज के लोगों को चिकित्सा-सुविधाओं से दूर कर देगी। अब तक दुनिया की करीब आधी आबादी को जोड़ना बेहद लाभदायक उद्यम रहा है, इसलिए बाकी बचे लोगों को भी जोड़ लेना स्वाभाविक ही कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। सैटेलाइट इंटरनेट के कई फायदे हैं। इसमें जमीन पर तार का जाल बिछाने के लिए किसी तरह की अनुमति नहीं लेनी पड़ती, जिस कारण लागत कम हो जाती है। खुदाई-कार्य न होने से पर्यावरण को कम नुकसान होता है। और, केबल की तुलना में 40 फीसदी अधिक गति से इंटरनेट सेवा मिल सकती है। हालांकि, कुछ दिक्कतें भी हैं। जैसे, इसमें लॉन्च की प्रक्रिया महंगी है, इसमें जटिल तकनीक की जरूरत होती है, और फिर आम लोगों के लिए इंटरनेट सेवा महंगी हो सकती है। एक बड़ा मसला मलबा भी है। हमारे ग्रह के चारों ओर चक्कर लगा रहे 3,000 से अधिक उपग्रह आपस में टकराकर 30 हजार टुकड़ों में बंट सकते हैं। हर एक टक्कर भविष्य की अन्य भिड़ंत का कारण भी बन सकती है, जो न सिर्फ अंतरिक्ष के अन्वेषण को मुश्किल बना सकता है, बल्कि धरती पर मलबों की बरसात भी करा सकता है। एस्ट्रिक्स कॉमिक्स शृंखला में तो कुछ जादुई लेप से इस मसले का हल हुआ है, लेकिन हम इंसानों के पास क्या बचाव का कोई नुस्खा है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

🛑ताकि देश की सेवा कर सकें भारतवंशी डॉक्टर

(फ्रैंक एफ इस्लाम, अमेरिकावासी उद्यमी व समाजसेवी)


(साभार हिंदुस्तान )


अप्रैल से, जब से महामारी की दूसरी लहर शुरू हुई है, भारत का स्वास्थ्य ढांचा मरीजों के बोझ से हांफ रहा है। चूंकि भारत कोविड-19 के खिलाफ बड़ी जंग लड़ रहा है, इसलिए अनुभवी योद्धाओं का एक ऐसा समूह है, जो वायरस पर जीत हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकता है। ये योद्धा हैं भारतीय मूल के अमेरिकी डॉक्टर। अगर भारत इन डॉक्टरों की योग्यता व दक्षता के इस्तेमाल का तरीका ढूंढ़ ले, तो इसे काफी फायदा होगा।

भारतवंशी अमेरिकी तीन वजहों से भारत की मदद करने को तैयार होंगे। पहला कारण, उनके पास कई ‘स्पेशल्टीज’ की योग्यता है, जो कोविड रोगियों के इलाज में महत्वपूर्ण है। हजारों भारतवंशी अमेरिकी डॉक्टर संक्रामक रोग में विशेषज्ञ हैं। यहां ऐसे भारतवंशी डॉक्टरों की संख्या 8,500 से अधिक है, जबकि भारत में बमुश्किल 100 के करीब संक्रामक रोग विशेषज्ञ हैं। यह दुखद है कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी भारत का चिकित्सा प्रतिष्ठान संक्रामक रोगों के इलाज के लिए बुनियादी ढांचा विकसित नहीं कर पाया है, जबकि यह मुल्क दुनिया के अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक संक्रामक रोगों का घर है। अमेरिका में हजारों ऐसे भारतवंशी डॉक्टर भी हैं, जो महामारी से लड़ने के लिए तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों- आपातकालीन चिकित्सा, हृदय रोग व फेफड़ा संबंधी बीमारियों के विशेषज्ञ हैं। दूसरी वजह, भारतवंशी अमेरिकी चिकित्सकों के पास कोरोना मरीजों की देखभाल का पर्याप्त अनुभव है। पिछले मार्च से देश के तमाम अस्पतालों में ये डॉक्टर कोरोना के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं। उन्हें इस खतरनाक वायरस की ताकत का प्रत्यक्ष अनुभव है और ये जानते हैं कि कैसे इसको हराना है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि जब जो बाइडन राष्ट्रपति चुने गए, तब जिस कोविड-19 सलाहकार बोर्ड का गठन किया गया था, उसके 16 सदस्यों में तीन भारतवंशी अमेरिकी भी थे। डॉक्टर विवेक मूर्ति को तो सह-अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी, जो अब अमेरिका के सर्जन जनरल हैं। तीसरा कारण यह है कि ये डॉक्टर अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखते हैं और संगठित हैं। अमेरिकन एसोशिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडियन ओरिजिन (एएपीआई) के मुताबिक, 1.2 लाख भारतवंशी डॉक्टर अमेरिका के अस्पतालों में काम कर रहे हैं। इस संस्था के मौजूदा अध्यक्ष का कहना है कि यह अमेरिका में चिकित्सकों का दूसरा सबसे बड़ा समूह है। पहले स्थान पर अमेरिकन मेडिकल एसोशिएशन है, जो देश के सभी चिकित्सकों और डॉक्टरी पढ़ रहे छात्र-छात्राओं का प्रतिनिधित्व करता है। अप्रैल के बाद से एएपीआई ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर, टेस्ट किट, मास्क, दवाई जैसे जरूरी सामान के साथ लाखों डॉलर की मदद भारत भेज चुका है। संगठन के अध्यक्ष का कहना है कि दूसरी लहर के शुरुआती दो सप्ताह के भीतर ही इस संस्था ने राहत-कार्यों के लिए 45 लाख डॉलर जुटा लिए। संगठन की वेबसाइट से पता चलता है कि 8,000 से अधिक चिकित्सकों और उनके परिजनों व दोस्तों ने पैसों से मदद की, जो बताता है कि भारतवंशी अमेरिकी डॉक्टर किस कदर अपनों की मदद करना चाहते हैं। यही नहीं, एएपीआई ने ‘टेली-हेल्थ’ की शुरुआत भी की, जिसके जरिए भारतवंशी डॉक्टर भारत में अपने समकक्षों व देश के सुदूर हिस्सों के मरीजों के संपर्क में रहते हैं। मगर दिक्कत यह है कि भारतीय नियम-कानून और भ्रष्टाचार इन डॉक्टरों की राह रोक रहे हैं। असल में, एएपीआई के कई सदस्यों ने भारत से ही पढ़ाई की है और अमेरिका आने से पहले वहां काम भी किया, पर समय के साथ उनके लाइसेंस बेकार हो गए, क्योंकि देश छोड़ने के बाद उन्होंने उसका नवीनीकरण नहीं कराया। इसलिए, नई दिल्ली से भारतवंशी डॉक्टरों को रियायत मिलनी चाहिए। एएपीआई के अध्यक्ष ने इसके बारे में भारत के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र भी लिखा है, पर अब तक उन्हें जवाब नहीं मिला है। भारतीय उच्चाधिकारियों को एएपीआई की गुजारिश पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और इन भारतवंशी डॉक्टरों की सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस व्यवस्था बनानी चाहिए। इसमें अधिक देरी भारत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है, जबकि हामी से भारतीयों को जबर्दस्त फायदा होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

🛑निष्क्रिय अराजकता या आत्मघाती प्रवृत्ति

(जैमिनी भगवती )

(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड )


करीब 60 वर्ष पहले जॉन केनेथ गालब्रेथ (सन 1961-63 तक भारत में अमेरिका के राजदूत) ने भारत को एक 'क्रियाशील अराजकता' के रूप में परिभाषित किया था। कोविड-19 महामारी से जुड़ी तमाम हृदयविदारक खबरें सामने आ रही हैं। राजधानी दिल्ली तथा देश के कई अन्य राज्यों में लोग अप्रैल से ही ऑक्सीजन और अस्पताल में बिस्तरों के लिए जूझते रहे हैं। कोविड महामारी ने देश के प्रशासनिक ढांचे की कमियों को बुरी तरह उजागर किया है। सरकार समय पर टीकाकरण करने में अक्षम रही है। सामूहिक अंतिम संस्कार और शवों को नदियों में बहाए जाने संबंधी रिपोर्ट आने के बाद देशवासियों को लगने लगा है कि क्या हम एक निष्क्रिय अराजकता के शिकार हैं।


सरकार दावा कर सकती है कि कोविड की दूसरी लहर की संक्रामकता का अनुमान लगा पाना मुश्किल था। परंतु निजी क्षेत्र और चिकित्सा शोध संस्थानों के साथ सहयोग करके घातक कोविड-19 वायरस की रोकथाम करने संबंधी आवश्यकता तो एकदम स्पष्ट थी। सरकार को सन 2020 केमध्य तक ही टीका उत्पादन के लिए पर्याप्त वित्तीय मदद मुहैया करा देनी चाहिए थी। इसके बजाय प्रधानमंत्री मोदी 28 जनवरी 2021 को दावोस में कोविड को लेकर एकदम आश्वस्त और स्वयं की सराहना करते दिखे।


मई 2021 के मध्य तक सरकार और नीति आयोग के प्रवक्ता यही सुझा रहे थे कि उन्होंने कोविड-19 की दूसरी लहर का अनुमान लगा लिया था और इस विषय में सार्वजनिक घोषणाएं कर दी थीं। यह दावा एकदम झूठा है। यदि सरकार और उसके विभाग दूसरी लहर के संभावित बड़े खतरे से अवगत थे तो देश में टीका उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया। बल्कि छह करोड़ टीके विदेश भेजकर ऐसा जताया गया मानो देश की जरूरतों के लिए पर्याप्त टीके मौजूद हों।


इन दिनों विदेशों में विकसित टीकों पर बौद्घिक संपदा अधिकार समाप्त करने की मांग काफी जोरशोर से हो रही है। जो टीके अभी भारत में इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं अगर उन पर ऐसे बौद्घिक संपदा अधिकार समाप्त भी कर दिया जाए तो भी देश में उन टीकों का भारत में उत्पादन शुरू होने में कम से कम छह महीने लगेंगे। मई 2021 के अंत में भारत के लिए सबसे बेहतर है कि वह सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक द्वारा निर्मित टीकों कोविशील्ड और कोवैक्सीन का उत्पादन बढ़ाए। इसके लिए उन्हें अधिक से अधिक पूंजी मुहैया कराई जाए और उत्पादन तेजी से बढ़ाया जाए।


बीबीसी की 5 मई, 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुछ राज्यों में प्रति 10,000 लोगों पर 10 से भी कम चिकित्सक हैं और कुछ अन्य राज्यों में यह अनुपात पांच से भी कम है। बीबीसी ने ब्रिटेन की नैशनल हेल्थ सर्विस का जिक्र नहीं किया जहां 26,000 भारतीय मूल के चिकित्सक हैं और उन्होंने अपनी चिकित्सा की पढ़ाई भी भारत में पूरी की है। 13 मई, 2021 को न्यू यॉर्कर पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कहा गया कि भारत में हर 10,000 आबादी पर नौ चिकित्सक हैं जो वैश्विक औसत का आधा और अमेरिका के तिहाई के बराबर है। आलेख के अनुसार देश की दोतिहाई आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जहां देश के केवल 20 फीसदी चिकित्सक हैं। नर्सों की कमी से हालात और बिगउ़ सकते हैं। अमेरिका में भारतीय मूल के एक लाख चिकित्सक हैं। इनमें से अधिकांश ने अपनी मेडिकल डिग्री भारत से ली लेकिन न्यू यॉर्कर की रिपोर्ट में इन आंकड़ों का कोई उल्लेख नहीं है। ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय मूल की नर्स भी बहुत बड़ी तादाद में रहती हैं।


सकारात्मक संदर्भ में बात करें तो ऊंचे वेतन और बेहतर माहौल के लिए विदेश में रहने का विकल्प होने के बावजूद बहुत बड़ी तादाद में चिकित्सकों और नर्सों ने भारत में काम करने का निर्णय किया। बीते 14 महीनों में देश में चिकित्सकों, नर्सों और सहायक कर्मचारियों ने घातक संक्रमण की आशंका के बीच दिन रात काम किया है। भारतीय चिकित्सा महासंघ (आईएमए) ने मई के मध्य में कहा कि कोविड-19 की पहली लहर में उसके पास पंजीकृत 728 चिकित्सकों का निधन हुआ। दूसरी लहर के दौरान भी 420 चिकित्सकों का निधन हुआ। देश में कोविड से कितनी नर्सों की जान गई इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों को उन चिकित्सकों और नर्सों के परिवारों के बारे में जानकारी जुटानी चाहिए जिन्होंने कोविड के कारण जान गंवा दी। इनके सर्वोच्च बलिदान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए और करदाताओं के फंड का इस्तेमाल करके कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से सांकेतिक श्रद्घांजलि के रूप में उनके परिजनों को उदार क्षतिपूर्ति दी जानी चाहिए।


एक अलग मामले में केयर्न एनर्जी पर अतीत से प्रभावी कर के मामले में हमें एक बार फिर केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार केयर्न ने अब एक अमेरिकी अदालत में एयर इंडिया को निशाने पर लिया है। इसने ऐसा 1.2 अरब डॉलर का वह मध्यस्थता अवार्ड हासिल करने के लिए किया है जो उसने दिसंबर 2020 में हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जीता था। जानकारी के मुताबिक भारत सरकार इस मध्यस्थता अवार्ड को चुनौती देने की तैयारी कर रही है और वह इस बात से बेपरवाह दिखती है कि भारत की निवेश केंद्र की छवि पर इसका विपरीत असर होगा।


किसी ऐसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी की बोर्ड बैठक में होने वाली काल्पनिक चर्चा पर विचार कीजिए जो भारत में किसी परियोजना के निवेश के अंतिम चरण में हो। बोर्ड यह विचार कर सकता है कि केयर्न और वोडाफोन पर अतीत से प्रभावी कर के मामले निपटने तक प्रतीक्षा कर ली जाए। सन 2019 में कोविड महामारी के पहले भारत और चीन (हॉन्ग कॉन्ग समेत) में क्रमश: 50.5 और 209.5 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया। स्रोत: यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड ऐंड डेवलपमेंट।


सन 1960 के दशक में जब गालब्रेथ ने हमारे देश को एक क्रियाशील अराजकता वाला देश बताया तब से भारत कई क्षेत्रों में भारी प्रगति कर चुका है। बहरहाल, बड़े भारतीय राजनीति दलों ने अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा और रोजगार निर्माण से ध्यान भटकाया और उसे धर्म, समुदाय, जाति और भाषाई भेद की ओर ले गए। क्रियाशील अराजकता या निष्क्रिय अराजकता जैसे जुमलों का इस्तेमाल आकर्षक हो सकता है लेकिन भारत के बारे में अधिक सटीक बयान यही होगा कि भारत आत्मघाती कदम उठाना जारी

रखे हुए है और जीत के मुंह से हार खींचकर वह अक्सर सहानुभूति रखने वाले पर्यवेक्षकों को भी चकित करता रहता है।


(लेखक भारत के पूर्व राजदूत एवं विश्व बैंक पेशेवर हैं)


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