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हिंदी लेख द्वितीय 10 April 21

Updated: Apr 11, 2021

कब समाप्त होगी दहकते जंगलों की व्यथा-गाथा

(ज्ञानेंद्र रावत, पर्यावरण कार्यकर्ता )

(साभार हिंदुस्तान )


देवभूमि उत्तराखंड के 13 में से 11 जिलों के जंगलों में लगी भीषण आग बेहद चिंतनीय है। सैकड़ों हेक्टेयर जंगल इसकी चपेट में आ गए हैं। संरक्षित वन क्षेत्र भी अब अछूते नहीं हैं। वन्य जीव ही नहीं, पालतू मवेशी भी आग से मर रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि आग राजमार्ग और बस्तियों तक पहुंच गई है। कीट-पतंगों, वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां स्वाहा हो रही हैं। आस-पास का पर्यावरण विषाक्त हो रहा है। उत्तराखंड में पिछले छह महीनों में जंगल में आग की 1,000 से अधिक घटनाएं हुई हैं। वन विभाग की मानें, तो फरवरी महीने से अब तक प्रदेश में आग लगने की 609 घटनाएं हुई हैं, जिनमें राज्य में 1263.53 हेक्टेयर जंगल आग की समिधा बन चुके हैं। कहा जा रहा है कि राज्य के वन विभाग, स्थानीय प्रशासन आदि के करीब 12,000 कर्मचारी आग बुझाने में लगे हुए हैं। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत केंद्रीय गृह मंत्री से मदद की गुहार लगा रहे हैं और एनडीआरएफ, हेलीकॉप्टर व बचावकर्मियों की मांग कर रहे हैं, लेकिन पांच राज्यों के चुनाव की वजह से उत्तराखंड के जंगलों की धधकती आग उपेक्षा का शिकार हो गई लगती है। यह निश्चित तौर पर बड़ी लापरवाही है। समझ नहीं आता कि हर साल यहां आग लगने की इतनी घटनाएं कैसे होती हैं।

दरअसल, आग लगने की घटनाओं का उत्तराखंड से पुराना नाता रहा है। पर घटनाओं में हो रही बढ़ोतरी कई सवाल खड़े करती है। आग की भयावहता को लेकर कई बरस पहले टिहरी निवासी एडवोकेट ऋतुपर्ण उनियाल ने देश की सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर की थी। याचिका में उनियाल ने कहा था कि राज्य के जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं के दुष्परिणाम-स्वरूप कीट-पतंगों, पक्षियों और जानवरों की हजारों प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। आग से उत्सर्जित कार्बन डाइ ऑक्साइड से पहाड़ तप रहे हैं। नतीजतन ग्लेशियर पिघल रहे हैं। प्रदूषण बढ़ रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। इससे पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। उन्होंने अदालत से मांग की थी कि इस बारे में तत्काल कार्रवाई की जाए, जिससे पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र, कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों व वन्य-जीवों की रक्षा हो सके। साथ ही, यह भी मांग की थी कि केंद्र, राज्य सरकार, राज्य के प्रधान वन संरक्षक को राज्य में आग की रोकथाम के लिए तत्काल नीति तैयार करने और आग लगने से पहले ही इससे निपटने की व्यवस्था करने का निर्देश दिया जाए। जंगलों के तबाह होेने का सबसे बड़ा कारण दावानल है। अब आग की नई रोशनी में सरकारों ही नहीं, अदालतों को भी जागना चाहिए। वन रक्षा के अपने दायित्व को निभाना सरकार के लिए प्राथमिकता होनी चाहिए। जंगलों में लग रही आग मानव निर्मित हो या प्राकृतिक, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हर साल जंगलों में लगने वाली भीषण आग का खामियाजा देश भुगतता है। सबसे बड़ी बात यह कि हिमालय से ही गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि अनेक नदियों का निकास है। ये नदियां करोड़ों देशवासियों की जीवन-दायिनी हैं। सारा का सारा कृषि ढांचा इन पर आधारित है। जंगलों की आग से हमारे पेट और पानी के सवाल सीधे तौर पर जुड़े हैं। दुख की बात यह है कि जंगलों की रक्षा के लिए जिम्मेदार लोग भी सतर्क नहीं हैं। हमारे जंगलात के महकमे का ढांचा इस प्रकार का है कि वह केवल घटना की सूचना देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। दरअसल, हमारी वन नीति के चलते पहले गांववासी, वनवासियों का वनों से जो सीधा रिश्ता था, वह खत्म हो गया है। सरकार द्वारा संचालित वन जागरूकता अभियान औपचारिकता मात्र रह गए हैं। इन अभियानों ने वनों के पास रहने वालों को उनसे दूर कर दिया है। कॉरपोरेट स्वामित्व के दौर में आज हालत यह है कि जंगल में आग की घटना होने पर जो लोग पहले आग बुझाने के लिए दौड़ पड़ते थे, वे अब यह काम सरकार का है, कहकर अपना मुंह मोड़ लेते हैं। वनरक्षकों की कमी पूरी करने पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। एक अध्ययन से खुलासा हुआ है कि दुनिया में यदि जंगलों के खत्म होने की यही रफ्तार रही, तो 2100 तक समूची दुनिया से जंगलों का पूरी तरह से सफाया हो जाएगा। जंगल की आंच हम तक तेजी से पहुंच रही है, अब हम सोए नहीं रह सकते।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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