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हिंदी लेख द्वितीय 11 April 21

खिलने को बेताब कुछ कश्मीरी ख्वाब

(शशि शेखर)

(साभार हिंदुस्तान )


कश्मीर घाटी में बर्फबारी की वजह से नंगे हो गए चिनारों की शाखाओं पर पुन: कोंपलें फूट चली हैं। इस महीने के अंत तक ये दरख्त फिर से सरसब्ज हो जाएंगे। क्या कश्मीर और कश्मीरीयत भी इसी तरह पुनर्जीवन प्राप्त करने जा रहे हैं? इस सवाल का जवाब देने से पहले मैं आपको उनमें से कुछ नौजवानों से मिलवाना चाहूंगा, जिनसे मैंने अपने परिवार के साथ पिछले छह दिनों में एक आम पर्यटक की हैसियत से मुलाकात की।

पहले हैं तौसीफ माजिद। यह नौजवान मुझे आतंक का गढ़ माने जाने वाले बारामूला के तंगमर्ग में मिला। पूछने पर बताया कि वह बीसीए का ‘एग्जाम’ दे चुका है, एमसीए की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा है और भारतीय सिविल सेवा का हिस्सा बनना चाहता है। क्यों और कैसे? मैंने जब यह सवाल पूछा, तब तक वह मेरी आंखों में पसरा अचरज पढ़ चुका था। उसने कहा, कश्मीर में पिछले दस सालों में तमाम लोग इस परीक्षा को पास कर चुके हैं। उम्मीद है कि मैं अपनी मेहनत के बलबूते अपने परिवार का नाम रोशन कर सकूंगा। अभी तक मेरे 85 फीसदी के आसपास नंबर आते रहे हैं। उससे विदा लेने के वक्त तक मेरा मन खिल उठा था। सपने देखने वाले नौजवान ही दुनिया को बेहतर बनाते हैं। यह पुलक दो दिन बाद पहलगाम में कई गुना बढ़ गई। हमने अपनी गाड़ी की खिड़की से दूर लिखा हुआ देखा- ‘पंजाबी वैष्णो ढाबा, शुद्ध शाकाहारी’। दो दिनों से एक-सा भोजन करते-करते हम उकता गए थे। ऐसे में, पंजाबी भोजन हम शाकाहारियों के लिए जैसे वरदान था। छोटे, परंतु बेहद साफ-सुथरे उस ढाबे में जैसे एक टेबल हमारे इंतजार में ही खाली रह बची थी। हम चारों मेन्यू पर बहस कर ही रहे थे कि एक भद्र नवयुवती सामने आ खड़ी हुई। शुद्ध अंग्रेजी में उसने पूछा, ‘सर, उम्मीद है कि आप लोगों ने अपना मेन्यू चुन लिया होगा। बताइए, मैं आपको क्या खिला सकती हूं?’

आतंकवाद से कठुआई धरती के इस छोटे से कस्बे में ऐसी नफासत की उम्मीद हमें न थी। सुस्वादु भोजन करते वक्त हमने पाया कि वह हर टेबल पर जाकर पूछती चलती कि आपको भोजन कैसा लगा? हमारे लिए कोई सलाह? हम भी जब बाहर निकले, तो वह हमारे पीछे-पीछे आ गई। उसके सवालों के जवाब देने के बाद मैंने उसका नाम पूछा। ‘गुरुप्रिया’, अपने नाम के साथ उसने यह भी बताया कि ‘हम कश्मीरी सिख हैं। यह ढाबा मेरे पिता ने खोला था, अब पिछले कुछ वर्षों से मैं चला रही हूं।’ उसकी तमन्ना इसे ‘हवेली’ और ‘चोखी ढाणी’ से भी आगे ले जाने की है, पर वह पंजाबी भोजन के साथ कश्मीरी रीति-रिवाजों को भी जिंदा रखना चाहती है। पूछने पर गुरुप्रिया ने यह भी बताया कि उसके ‘अंकल’ भी ऐसा ही पंजाबी रेस्तरां पास में चलाते हैं और यहां सिखों के चार परिवार बसते हैं।

वापसी के लिए गाड़ी में बैठते वक्त मेरे मन में ख्याल आ रहा था कि 18 बरस बाद यहां आया हूं। अगर फिर इतने ही साल बाद आना हुआ, तो शायद तब तक यह नवयुवती अपने ख्वाबों को पूरा कर चुकी होगी। घाटी की परिक्रमा लगाते वक्त नए होटल, चौड़ी सड़कें और बढ़ता कारोबार उम्मीद बंधाने वाला था। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि सब कुछ सामान्य हो चला है। कुछ के मन में अभी भी असंतोष और अलगाव के भाव जिंदा हैं। कट्टरपंथी तत्व इन्हें बढ़ावा देते हैं।

मैं जब 29 मार्च की दोपहर गुरुप्रिया से बात कर रहा था, तभी बारामूला जिले के सोपोर में नगरपालिका दफ्तर के बाहर आतंकी प्रखंड विकास परिषद (बीडीसी) के सदस्य और उसके निजी सुरक्षाकर्मी पर गोलियां बरसा रहे थे। पहली अप्रैल को जब हम श्रीनगर शहर में दोबारा दाखिल हो रहे थे, तब पता चला कि कुछ देर पहले नौगांव में भाजपा के एक कार्यकर्ता पर जानलेवा हमला किया गया, जिसमें उसका सुरक्षाकर्मी मारा गया। इंस्टीट्यूट फॉर कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के मुताबिक, पिछले साल, यानी 2020 में 140 आतंकी वारदातों में 321 लोगों को जान गंवानी पड़ी। इनमें 33 निर्दोष कश्मीरी, 56 सुरक्षाकर्मी और 232 दहशतगर्द शामिल हैं। मतलब साफ है। दहशतगर्दी की इस जंग में सर्वाधिक क्षति दहशतगर्दों की हो रही है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कोई बड़ा उपद्रव न होने की एक वजह सुरक्षाबलों की कारगर सक्रियता भी है।

उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा अच्छी तरह से जानते हैं कि घाटी में अमनो-अमान कायम करने के लिए आम कश्मीरी का दिल जीतना होगा। यही वजह है कि वह एक निश्चित दिन नागरिकों से सीधे मिलते हैं। वहां सभी प्रमुख अधिकारी उपस्थित रहते हैं और इस मुलाकात के दौरान लोगों की समस्याओं को तत्काल प्रभाव से हल किया जाता है। उन्होंने प्रत्येक पंचायत में एक शिकायत पेटिका रखवाई है और लोगों की दिक्कतें दूर करने के लिए प्रत्येक बुधवार को प्रखंड दिवस का कार्यक्रम शुरू किया गया है। एक कारोबारी ने मुझे बताया कि कश्मीर घाटी में बर्फबारी के दौरान ट्रांसफॉर्मर फुंकने की शिकायतें आम थीं। पिछले साल तक उन्हें बदलने में कई-कई दिन लग जाते थे। इस बार बर्फ गिरने से पहले ही उप-राज्यपाल ने विद्युत निगम के प्रबंध-निदेशक को आदेश दिया कि शहरी इलाकों में 24 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक से अधिक 48 घंटों के भीतर ट्रांसफॉर्मर बदलने की व्यवस्था हर हाल में करें। कश्मीर के लोगों को यह देखकर सुखद एहसास हुआ कि विद्युतकर्मी आपूर्ति सुचारू करने के लिए खुद बर्फ हटाते हुए पैदल उनके मोहल्ले और गांव तक पहुंचे। जनता के हक-हुकूक के प्रति जवाबदेही और सीधे संवाद का नतीजा है कि छात्रवृत्ति पाने के लिए विद्यार्थियों की कतार लग गई है। पिछले वित्त-वर्ष में आठ लाख विद्यार्थियों को विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत मदद मिली थी। इस बार तो दिसंबर 2020 तक ही इसके लिए 9.5 लाख आवेदन आ चुके थे। अब शायद आपको तंगमर्ग के तौसीफ के आत्मविश्वास की वजह मालूम पड़ गई होगी।

केंद्र सरकार ने भी घर-घर जल पहुंचाने के साथ सड़कों, सुरंगों, पुलों और रेल मार्गों के लिए खजाना खोल रखा है। एक सरकारी कर्मचारी मोहम्मद अमीन इस बात से बेहद खुश दिखे कि श्रीनगर को जम्मू से जोड़ने वाली रेल परियोजना पर तेजी से काम हो रहा है। मोहम्मद अमीन का मानना है कि दिल्ली और श्रीनगर के बीच ट्रेन चलने के बाद हमारे बच्चों के लिए ऊंची तालीम और तरक्की के रास्ते खुल जाएंगे। लंदन से एमबीए कर श्रीनगर लौटे एक नौजवान उद्यमी ने बताया कि कोई कुछ भी कहे, पर हम लोग बरसों बाद फिर से आशान्वित हैं। मैं एक होटल बना रहा हूं। अगर मुझे हालात सुधरने का भरोसा न होता, तो मैं भला क्यों इतना बड़ा निवेश करने की सोचता? उसी ने जानकारी दी कि इस पूरे हफ्ते छुट्टियों की वजह से श्रीनगर के लगभग सभी प्रमुख होटल बुक हैं। वह गलत नहीं कह रहा था। मैं और मेरा परिवार भी सैलानियों के इस प्रवाह का हिस्सा थे। पुराने सवाल पर लौटता हूं। क्या इस बार चिनारों के साथ कश्मीर के ख्वाबों को कुछ और खिलने का मौका मिलेगा? मुझे लगता है कि हमें इस नेक उम्मीद से गुरेज नहीं करना चाहिए।


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