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हिंदी लेख 9 April 21

Updated: Apr 11, 2021

राफेल विमान सौदे पर फिर उठे सवालों के निहितार्थ

(अभिजीत अय्यर मित्र, सीनियर फेलो, आईपीसीएस )


(साभार हिंदुस्तान )


फ्रेंच मीडिया हाउस ‘मीडियापार्ट’ ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे के बारे एक बार फिर कुछ खुलासे किए हैं। इससे एक बार फिर यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भ्रष्टाचार के बगैर क्या रक्षा सौदा हो सकता है? अब कई देश हैं, जहां रक्षा सौदे भ्रष्टाचार के बिना किए जाते हैं और हम भी आहिस्ता-आहिस्ता उसी ओर बढ़ रहे हैं। मगर यह एक सतत प्रक्रिया है। ऐसा नहीं हो सकता कि एक दिन आप बोल दें, खुल जा सिम-सिम और सारा भ्रष्टाचार खत्म हो जाए। हमें यह देखना पड़ेगा कि मीडियापार्ट ने क्या वाकई कोई इतना बड़ा खुलासा किया है और क्या यह वास्तविक भ्रष्टाचार दिखा रहा है? रिपोर्ट में लिखा है कि फ्रांस ने एक ऑडिट किया था, इस दौरान पता चला कि राफेल की निर्माता कंपनी दसॉल्ट ने दिल्ली में एक बिचौलिए को दस लाख यूरो दिए थे। सवाल उठता है कि ये रुपये क्यों दिए गए? यह भुगतान इसलिए किया गया था कि बिचौलिया राफेल की अनुकृति या मॉडल विभिन्न लोगों को तोहफे में देने के लिए तैयार करे। अब इनमें से एक मॉडल दिल्ली में एयर चीफ मार्शल के घर के बाहर दिखाई देगा। एक अन्य अंबाला कमांडर के घर के बाहर और एक एयर फोर्स मुख्यालय के बाहर दिखाई देगा। अभी भी पांच मॉडल बेंगलुरु के स्टोर में पडे़ हैं, जिन्हें किसी को तोहफा नहीं दिया गया है। अब मीडियापार्ट का कहना है कि यह भ्रष्टाचार था। सवाल है कि क्या वास्तव में भ्रष्टाचार हुआ है? मॉडल निर्माताओं से बात करने पर पता चलता है कि ऐसा हो नहीं सकता कि एक ऐसा राफेल का स्केल मॉडल 17 लाख रुपये का हो। यह अधिकतम तीन या चार लाख रुपये के अंदर बनाया जा सकता है। अधिकतम भी आप खर्च करोगे, तो मॉडल साढे़ पांच लाख रुपये में बनाया जा सकता है, 17 लाख रुपये का तो कतई नहीं हो सकता। बिचौलिए की कंपनी को अगर पूरे दस लाख यूरो मिले हैं, तो बाकी पैसे कहां गए, दाल में काला लगता है। कई सारे सवाल उठते हैं। आम तौर पर पहले रिश्वत दी जाती है, उसके बाद सौदा होता है। इस मामले में सौदा सितंबर 2016 में हुआ था और अगर यह रिश्वत दी गई है, तो छह महीने बाद दी गई है। कुल सौदा 7.8 बिलियन यूरो का है, तो एक अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसकी कमीशन अगर है, तो इतनी कम कैसे? अगर वाकई बिचौलिए के जरिए भुगतान हुआ है, तो फिर किसको हुआ है? जिन्होंने कथित रिश्वत का खुलासा किया है, यह उन्हें भी नहीं पता। क्या राफेल बनाने वाली कंपनी को ठगा गया है? पांच लाख में जो मॉडल बन सकता था, उसके लिए 17 लाख रुपये वसूले गए हैं। यह सब जांच का विषय है।

हमें यह भी देखना होगा कि कथित दलाली वर्ष 2017 में दी गई थी, फिर उसी व्यक्ति या बिचौलिए को वर्ष 2019 में अगस्ता वेस्टलैंड सौदे और मनी लॉन्डरिंग में क्यों गिरफ्तार किया गया था? अगर बिचौलिए ने किसी को रिश्वत दी होती, तो वह गिरफ्तार नहीं होता, क्योंकि इससे बड़े नामों के खुलासे का खतरा होता। मुंबई में सचिन वाजे मामले में क्या हुआ, जैसे ही एक नाम खुला, वैसे ही बड़े-बडे़ नाम सामने आने लगे।

आखिर मीडियापार्ट है कौन? फ्रांस के अंदर ही इसका विशेष सम्मान नहीं है। निम्न स्तरीय पत्रकारिता के लिए इसे जाना जाता है। इसने राफेल मामले में कई सारे आरोप लगाए थे, लेकिन इसका एक भी आरोप टिक नहीं पाया। हमें यहां यह भी समझना चाहिए, दो अलग-अलग मामलों को मिलाया जा रहा है। अर्थात एक अन्य घोटाला है, जिसे राफेल के साथ जोड़ा जा रहा है। एक है राफेल का सौदा और एक है राफेल खिलौना सौदा, तो यह राफेल खिलौना घोटाला है। इसकी जरूर जांच होनी चाहिए। राफेल सौदे में तो देश की सर्वोच्च अदालत ने भी बोल दिया था कि कोई भी घोटाला नहीं हुआ है। जो लोग आरोप लगा रहे हैं, वे अपने आरोप साबित नहीं कर पाए हैं। अभी आरोप यह लग रहा है कि चूंकि राफेल खिलौने में घोटाला हुआ है, इसलिए राफेल सौदे में भी घोटाला है। कुल मिलाकर, हमें यह समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज एक सतत प्रक्रिया है, हम इस दिशा में बढ़ रहे हैं। भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है, लेकिन पहले की तुलना में सुधार जरूर हुआ है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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